राधा जी ने श्रीकृष्ण से अनन्य प्रेम के चलते कठोर वचन कहे और उन्हें तरह-तरह से उपालंभ भी दिए। राधा की इस बात का कृष्ण के सखा सुदामा ने विरोध किया। राधा जी को क्रोध आ गया, तो उन्होंने सुदामा को असुर होने का शाप दे दिया। यह सब भगवान की लीला थी और लीला-क्रम में ही सुदामा ने भी राधा जी को मानव रूप में प्रकट होने और फिर कृष्ण से अलग हो जाने का शाप दे डाला। राधा जी के शाप के कारण सुदामा ने शंखचूड़ नामक असुर के रूप में जन्म लिया, जिसका संहार भगवान महादेव ने अपने त्रिशूल से किया था। इस तरह असुर योनि से मुक्ति पाकर सुदामा गोलोक लौट गए। कालांतर में सुदामा के शापवश, राधा ने भूलोक पर अवतार लिया। वे वृषभानु नामक वैश्य की पुत्री बनीं। उनकी माता का नाम कलावती था। उनकी माता कलावती ने अपने गर्भ में वायु को धारण किया था, और उसी वायु से राधा प्रकट हुईं। इस प्रकार, श्रीराधा अयोनिजा थीं, अर्थात उनका जन्म माता की योनि से नहीं हुआ, बल्कि वे योगमाया से प्रकट हुईं।
- बारह वर्ष की आयु में जब श्रीराधा, यौवन में प्रवेश करने लगीं, तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया। गोकुल में माता यशोदा के भाई रायाण वास्तव में गोलोक के गोप थे, जो इस जन्म में कृष्ण के मामा हुए।
श्रीराधा का विवाह रायाण से हो गया। इस बीच, विधाता ने स्वयं वृंदावन में राधा-कृष्ण का दिव्य विवाह संपन्न कराया। इस तरह साक्षात राधा श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल में वास करती थीं और छाया राधा रायाण के घर में। वृंदावन में श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के साथ अनेक लीलाएं कीं। किंतु सुदामा के शापवश उनका वियोग भी हुआ। सौ वर्ष पूर्ण होने पर राधा और कृष्ण का पुनः मिलन हुआ। तत्पश्चात वे दोनों गोलोक लौट गए। उनके साथ यशोदा और कलावती भी चली गईं। नंद के रूप में प्रजापति द्रोण व यशोदा के रूप में उनकी पत्नी धरा प्रकट हुईं। उनके तप से ही उन्हें कृष्ण पुत्ररूप में प्राप्त हुए। वसुदेव महर्षि कश्यप थे और देवकी सती अदिति का अंश थीं। प्रत्येक कल्प में भगवान जब अवतरित होते हैं, तब वही कश्यप और अदिति उनके माता-पिता बनते हैं। राधा की माता कलावती पितरों की मानस पुत्री थीं, और वृषभानु गोलोक के वसुदाम गोप थे।
श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट होते हैं-द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज नारायण वैकुंठ में निवास करते हैं और उनकी पत्नियां महालक्ष्मी, सरस्वती, गंगा व तुलसी हैं। द्विभुज रूप में स्वयं श्रीकृष्ण गोलोक में हैं और उनकी अर्धांगिनी श्रीराधा हैं। वे तेज, रूप और गुण में कृष्ण के समान हैं। कृष्ण के बाद धर्म, ब्रह्मा, शंकर, अनंत, वासुकि, सूर्य, चंद्रमा आदि सभी ने राधा की पूजा की। आगे इंद्र, रुद्रगण, मनु, देवगण और समस्त मानवों ने भी उनकी वंदना की। सातों द्वीपों के सम्राट सुयज्ञ ने भी भारतवर्ष में राधा की पूजा की थी। एक समय किसी ब्राह्मण के शाप से राजा सुयज्ञ का हाथ रोगग्रस्त हुआ और राज्य भी छिन गया। ब्रह्मा जी के दिए हुए स्तोत्र से श्रीराधा की स्तुति करके राजा ने उनके अभेद्य कवच को कंठ और बांह में धारण किया तथा पुष्कर तीर्थ में सौ वर्षों तक ध्यानपूर्वक उनकी पूजा की। अंत में महाराज सुयज्ञ श्रीराधा जी की कृपा से गोलोक धाम चले गए। विद्वान पुरुष को पहले राधा का और फिर कृष्ण का नाम लेना चाहिए, अन्यथा वह पाप का भागी होता है। कार्तिक पूर्णिमा को कृष्ण ने राधा का पूजन कर महोत्सव मनाया। उन्होंने राधा-कवच को धारण किया और राधा के चबाए हुए तांबूल को प्रसाद रूप में ग्रहण किया। राधा कृष्ण की पूज्या हैं और कृष्ण राधा के। वे दोनों एक-दूसरे के इष्ट देव हैं, जो उनके बीच भेद करता है, वह नरक में जाता है।