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जानना जरूरी है: राधा की उपासना के लिए पितामह ब्रह्मा ने दिया षोडशाक्षर मंत्र, फिर भगवती तुलसी का प्रादुर्भाव

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 16 Feb 2025 05:32 AM IST

सार

तुलसी ने ब्रह्माजी से कहा, ‘पितामह! मैं पूर्वजन्म में तुलसी नाम की गोपी थी। परंतु एक दिन रास की अधिष्ठात्री देवी राधा ने रोष में मुझे शाप दिया, ‘तुम मानव-योनि में उत्पन्न होओ।’
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


कृष्ण के वचन के बाद मैंने वह शरीर त्याग दिया और फिर भूमंडल पर उत्पन्न हुई। मैंने यह तपस्या भगवान नारायण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए की थी। अब आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करने की कृपा करें।’


ब्रह्मा बोले-‘श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न सुदामा नामक एक गोप ने भी राधिका के शाप से दनु के कुल में जन्म लिया है। वह ‘शंखचूड़’ नाम से प्रसिद्ध है। वह इस समय समुद्र में विराजमान है। उसे पूर्वजन्म की सभी बातें स्मरण हैं। तुम भी पूर्वजन्म के सभी प्रसंगों से परिचित हो। इस जन्म में वह श्रीकृष्ण का अंश तुम्हारा पति होगा। इसके बाद भगवान नारायण तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। लीलावश वे नारायण तुमको शाप देंगे, जिसके कारण तुम्हें वृक्ष बनकर भारत में रहना पड़ेगा और समस्त जगत को पवित्र करने की योग्यता तुम्हें प्राप्त होगी। संपूर्ण पुष्पों में तुम प्रधान मानी जाओगी। भगवान् विष्णु तुम्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय मानेंगे। तुम्हारे बिना पूजा निष्फल समझी जाएगी। वृंदावन में वृक्ष रूप में रहते समय लोग तुम्हें ‘वृंदावनी’ कहेंगे। तुमसे उत्पन्न पत्तों से गोपी और गोपों द्वारा भगवान माधव की पूजा संपन्न होगी। तुम मेरे वर के प्रभाव से वृक्षों की अधिष्ठात्री देवी कहलाओगी।’

ब्रह्मा की अमर वाणी सुनकर तुलसी हर्षित हो गई। उसने ब्रह्मा को प्रणाम किया और बोली, पितामह! दो भुजा से शोभा पाने वाले श्यामसुंदर भगवान श्रीकृष्ण को पाने के लिए मेरी जैसी अभिलाषा है, वैसी चतुर्भुज श्रीविष्णु के लिए नहीं है; परंतु उन गोविंद की आज्ञा से ही मैं चतुर्भुज श्रीहरि के लिए प्रार्थना करती हूं। भगवन! आप ऐसी कृपा करें कि उन्हीं गोविंद को मैं पुनः प्राप्त कर सकूं। साथ ही मुझे राधा के भय से भी मुक्त कर दीजिए। ब्रह्माजी बोले, ‘मैं राधा के षोडशाक्षर मंत्र का उपदेश तुम्हें देता हूं। तुम इसे हृदय में धारण कर लो। इसके प्रभाव से तुम राधा को प्रिय हो जाओगी। भगवान गोविंद के लिए तुम वैसी ही प्रेयसी बन जाओगी, जैसी राधा हैं। इस प्रकार ब्रह्मा ने तुलसी को भगवती राधा का षोडशाक्षर मंत्र प्रदान किया। साथ ही स्तोत्र, कवच, पूजा की संपूर्ण विधियां तथा किस क्रम से अनुष्ठान करना चाहिए-ये सभी बातें भी बतलाईं। इसके बाद देवी तुलसी ने भगवती राधा की उपासना की और उनकी कृपा से वह भी राधा के समान सिद्ध हो गईं। उस मंत्र के प्रभाव से ब्रह्मा ने जैसा कहा था, वैसा ही फल तुलसी को प्राप्त हुआ। तपस्या-संबंधी जो भी क्लेश थे, वे मन से सदा के लिए दूर हो गए।

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