दरअसल, इस घोषणा का आधार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की हालिया रिपोर्ट है, जिसके अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत का नॉमिनल जीडीपी करीब 4,187 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो जापान के करीब 4,186 अरब डॉलर के अनुमानित जीडीपी से कुछ अधिक है। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों, बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश के अनुकूल माहौल के दम पर वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत किया है।
नीति आयोग की दसवीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में सुब्रह्मण्यम ने यह अनुमान भी लगाया कि अगले ढाई से तीन वर्षों में भारत जर्मनी को पीछे छोड़ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। यह उपलब्धि आर्थिक दृष्टि से गर्व का विषय होने के साथ भारत की नीतिगत दूरदर्शिता, जनसांख्यिकीय शक्ति और वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती भूमिका का प्रतीक भी है। हमने एक पड़ाव पार किया है, लिहाजा यह उत्सव का समय है, लेकिन साथ ही, यह आत्ममंथन का भी समय है।
दरअसल, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आकार आर्थिक विकास का महज एक पहलू है। आय असमानता, बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार जैसे क्षेत्रों में जापान जैसे विकसित देशों से अब भी हमें काफी कुछ सीखने की जरूरत है। जापान की अर्थव्यवस्था, भले ही आकार में अब भारत से छोटी हो, संस्थागत विश्वसनीयता, कार्य संस्कृति और उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं के लिए जानी जाती है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में जापान (33,960 डॉलर) भारत से (2,880 डॉलर) कहीं आगे है। लिहाजा भारत को इन क्षेत्रों में सुधार करके आर्थिक आकार के साथ ही समग्र विकास के मामले में भी वैश्विक मापदंड स्थापित करने होंगे। फिर भी, इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले दस वर्षों में करीब 105 फीसदी बढ़ी है, और इस मामले में वह अमेरिका, चीन और जर्मनी से भी आगे है।
2019 में ब्रिटेन व फ्रांस और अब जापान को पीछे छोड़ना, एक ऐतिहासिक क्षण है, जो हमें अपनी अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा के प्रति आश्वस्त करता है, लेकिन इस बिंदु पर याद रखना जरूरी है कि आर्थिक विकास का असली मापदंड यह है कि इससे आम नागरिक के जीवन में कितना बदलाव आता है।