फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

आर्थिकी: बीते 11 साल में 55.16 करोड़ खाते जन धन योजना के तहत... ये वित्तीय रूपांतरण का लॉन्चपैड

दिलीप अस्बे Published by: शुभम कुमार Updated Thu, 04 Sep 2025 05:08 AM IST

सार

प्रधानमंत्री जन धन योजना ने 11 वर्षों में 55.16 करोड़ बैंक खातों और 2.68 लाख करोड़ रुपये जमा के साथ दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल का दर्जा हासिल कर लिया है। सरकार अब निष्क्रिय खातों को सक्रिय करने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर केवाईसी अभियान चला रही है। योजना का 67% लाभ ग्रामीण भारत को मिल रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रधानमंत्री जनधन योजना। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क


सरकार ने निष्क्रिय खातों को फिर से प्रचलन में लाने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर पुनः केवाईसी और पुनः सक्रियण अभियान (जुलाई-सितंबर 2025) आरंभ किया है। वित्त मंत्रालय की निगरानी में ‘खोले गए खातों’ से ‘सार्थक रूप से उपयोग किए गए खातों’ की ओर यह परिवर्तन पीएमजेडीवाई के अगले चरण को परिभाषित करेगा और इसके प्रभाव को प्रतीकात्मक समावेशन से स्थायी सशक्तीकरण की ओर ले जाएगा। जन धन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी (जेएएम ट्रिनिटी) ने भारत के आर्थिक ईकोसिस्टम में क्रांति ला दी है। आज, 99 प्रतिशत वयस्कों के पास बायोमेट्रिक आईडी है, जिससे बैंक खाते खोलना सरल हो गया है और तत्काल डिजिटल भुगतान की नींव रखी गई है। लगभग 67 प्रतिशत पीएमजेडीवाई खाते ग्रामीण हैं, जो 36.6 करोड़ से अधिक बैंक खातों के बराबर हैं।


इतना ही नहीं, 55 प्रतिशत से अधिक खातों के साथ पीएमजेडीवाई ने वित्तीय समावेशन को वास्तव में जेंडर-समावेशी बना दिया है। ये खाते पेंशन से लेकर मनरेगा मजदूरी और पीएम-किसान सब्सिडी से लेकर उज्ज्वला हस्तांतरणों तक सरकारी लाभों के लिए वितरण का माध्यम बन गए हैं। जन धन के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) ने लीकेज और बिचौलियों को समाप्त कर दिया है, जिससे सीधे लाभार्थियों के हाथों में तत्काल पैसा पहुंचाया जा रहा है।


भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का वित्तीय समावेशन सूचकांक (एफआई-इंडेक्स), जो वित्तीय सेवाओं की पहुंच, उपयोग और गुणवत्ता में वित्तीय समावेशन की सीमा को मापता है, वर्ष 2025 में बढ़कर 67 हो गया, जो वर्ष 2021 की तुलना में 24.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। यह निरंतर प्रगति ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान ईकोसिस्टम के विस्तार, लक्षित सरकारी योजनाओं और मजबूत बैंकिंग पहुंच के प्रभाव को रेखांकित करती है। जन धन खाताधारकों को अगस्त 2025 तक 38.6 करोड़ से अधिक रुपे कार्ड जारी किए जा चुके हैं।


पीएमजेडीवाई ने ‘खाते खोलने’ से हटकर सक्रिय, डिजिटल रूप से सशक्त उपयोगकर्ता बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है। अनौपचारिक नकदी रखने के बजाय ग्रामीण परिवारों के पास अब बिचौलियों के बिना सरकारी योजनाओं तक पहुंच और औपचारिक बचत चैनल हैं। साथ ही, ऐसे डिजिटल टूल हैं, जो महिलाओं को धन पर अधिक नियंत्रण, त्वरित राहत और कोविड जैसी घटनाओं के दौरान अधिक पारदर्शिता प्रदान करते हैं।

 स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), सूक्ष्म-व्यवसाय और किसान अब दैनिक लेनदेन को डिजिटल रूप से प्रबंधित कर सकते हैं, क्रेडिट हिस्ट्री बना सकते हैं और औपचारिक ऋण तक अधिक सुगमता से पहुंच सकते हैं। इससे अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता कम होती है और आर्थिक लचीलापन बढ़ता है।


जन धन योजना में निरंतर और सकारात्मक प्रभाव बनाए रखने के लिए कई क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है। पहला, डिजिटल साक्षरता को और विस्तारित किया जाना चाहिए, जिससे कि हर खाताधारक इनका आत्मविश्वास के साथ उपयोग कर सके। दूसरा, दूरदराज के गांवों में कनेक्टिविटी को और बेहतर बनाया जाना चाहिए, ताकि हर कोने तक रीयल-टाइम भुगतान पहुंच सके। तीसरा, वह दिन दूर नहीं, जब हर घर में एक स्मार्ट फोन होगा, जिसका इस्तेमाल इंटरनेट एक्सेस करने, यूपीआई और अन्य डिजिटल सिस्टम का उपयोग करने के लिए किया जाएगा और नकदी पर निर्भरता कम होगी।
विज्ञापन


स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री जन धन योजना केवल एक सरकारी योजना भर नहीं है, बल्कि भारत के वित्तीय रूपांतरण का लॉन्चपैड है। रुपे कार्ड, एईपीएस ने द्वार खोले, यूपीआई ने बाजार को हर किसी की अंगुलियों पर ला दिया और साथ मिलकर, यह ‘ट्रिनिटी’ भारत के बैंकिंग, भुगतान और विकास के तरीके को नया रूप दे रही है और साथ ही आगे भी बढ़ रही है।

-लेखक भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next