फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

भारत के स्वतंत्र विदेश नीति की मिसाल: न पूरा जुड़ाव न किसी दूसरे खेमे में बंद; अब वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व...

आनंद कुमार
Updated Thu, 04 Sep 2025 04:58 AM IST

सार

भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति उसके लिए लाभकारी स्थिति पैदा करती है। भारत न तो पूरी तरह अमेरिका से जुड़ना चाहता है और न ही चीन-रूस खेमे में बंद होना चाहता है। वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखते हुए वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
एससीओ सम्मेलन में व्लादिमीर पुतिन, पीएम नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग - फोटो : ANI


इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस समय वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए नए व्यापारिक शुल्कों और संरक्षणवादी नीतियों ने वैश्विक आर्थिक ढांचे को झकझोर दिया है। इसके अलावा, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सक्रियता ने चीन और रूस को करीब ला दिया है। ऐसे समय में भारत का इस मंच पर सक्रिय भागीदारी करना और संतुलित भूमिका निभाना अपने आप में रणनीतिक संदेश है। भारत एक ओर पश्चिमी देशों से अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर वह इस बात से भी अवगत है कि पड़ोसी देशों से कटकर वह अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा और विकास संबंधी आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता।


तियानजिन सम्मेलन में भारत और चीन, दोनों ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आपसी संवाद अनिवार्य है। बेशक सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे अब भी दोनों देशों के रिश्तों पर भारी हैं, लेकिन आर्थिक साझेदारी और वैश्विक दक्षिण के हितों की रक्षा के लिए तालमेल आवश्यक है। भारत ने यह रेखांकित किया कि आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ जैसी चुनौतियों का सामना केवल सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। चीन ने भी इस पर जोर दिया कि सहयोग और साझेदारी ही एशिया की स्थिरता और समृद्धि की कुंजी है।


इस पूरे घटनाक्रम का एक संदेश यह है कि भारत और चीन, दोनों अब टकराव से हटकर संवाद की ओर बढ़ना चाहते हैं। इसमें निश्चित ही रणनीतिक गणना भी शामिल है। चीन को यह भलीभांति पता है कि उसकी बेल्ट एंड रोड पहल और वैश्विक आर्थिक महत्वाकांक्षाएं तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकतीं, जब तक भारत जैसे बड़े पड़ोसी के साथ उसके रिश्ते तनावपूर्ण बने रहेंगे। भारत भी यह समझता है कि एक ही समय में चीन और पाकिस्तान, दोनों से खुले टकराव की स्थिति में रहना उसकी दीर्घकालिक विदेश नीति और आर्थिक विकास लक्ष्यों के लिए हानिकारक हो सकता है। इसीलिए भारत ऐसे अवसरों की तलाश में है, जहां वह अपने सुरक्षा हितों से समझौता किए बिना चीन से संवाद बनाए रख सके।


एससीओ की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संगठन भले ही अब तक नाटो जैसी सैन्य प्रभावशाली ताकत के रूप में उभर कर सामने नहीं आया है, लेकिन इसकी प्रासंगिकता इस बात में है कि यह एशिया के बड़े देशों को एक साझा मंच प्रदान करता है। ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियान, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर एससीओ के माध्यम से ठोस प्रगति की संभावना बनी रहती है। खासकर ऐसे समय में, जब पश्चिमी मंचों पर एशियाई देशों की आवाज अक्सर दब जाती है, एससीओ उन्हें अपने हितों को सामने रखने का अवसर देता है।


इस सम्मेलन का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि रूस और चीन, दोनों ने भारत की भागीदारी को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पश्चिमी दुनिया से लगभग कट चुका है। उसके लिए चीन तथा भारत जैसे साझेदारों का महत्व और भी बढ़ गया है। चीन भी नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह पश्चिमी खेमे की ओर झुक जाए। इस संदर्भ में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति उसके लिए लाभकारी स्थिति पैदा करती है। भारत न तो पूरी तरह अमेरिका से जुड़ना चाहता है और न ही चीन-रूस खेमे में बंद होना चाहता है। वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखते हुए वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है।


उल्लेखनीय है कि भारत-चीन संबंधों में सुधार की संभावना केवल सम्मेलनों या औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि तमाम तनावों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। 2024 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 135 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। यह बताता है कि व्यावहारिक धरातल पर दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए किसी भी बड़े राजनीतिक टकराव से दोनों को नुकसान होगा और यह बात दोनों की समझ में भी आती है। फिर भी, यह कहना जल्दबाजी होगी कि तियानजिन सम्मेलन ने भारत-चीन संबंधों को पूरी तरह सामान्य बना दिया है। सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति जैसे कई मुद्दे अब भी जटिल बने हुए हैं। यह जरूर कहा जा सकता है कि यह सम्मेलन दोनों देशों को संवाद के एक ऐसे रास्ते पर ले गया है, जहां तनाव को कुछ हद तक कम किया जा सके और भविष्य में बेहतर संबंधों की संभावना बनी रहे।
विज्ञापन


दीर्घकालिक दृष्टि से देखें, तो भारत और चीन के बीच सहयोग की संभावना केवल द्विपक्षीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि बहुपक्षीय मंचों पर भी है। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक वित्तीय अस्थिरता, खाद्य सुरक्षा और नई प्रौद्योगिकियों के नियमन जैसे मुद्दों पर दोनों देशों का सहयोग वैश्विक दक्षिण को मजबूती दे सकता है। दोनों देश यह भी जानते हैं कि अगर वे आपसी टकराव में उलझे रहे, तो तीसरे पक्षों के लिए हस्तक्षेप करना और भी आसान हो जाएगा। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच एक न्यूनतम समझ बनाए रखना आवश्यक है।


तियानजिन शिखर सम्मेलन को इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। यह सम्मेलन कोई चमत्कारिक समाधान लेकर नहीं आया, लेकिन इसने यह संदेश अवश्य दिया कि संवाद और सहयोग के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। भारत और चीन के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि वे अपने मतभेदों को बातचीत और धैर्य से सुलझाने की दिशा में कदम उठाएं। अगर ऐसा होता है, तो न केवल दक्षिण एशिया व पूर्वी एशिया, बल्कि पूरी दुनिया में स्थिरता और शांति को बढ़ावा मिलेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next