इस समय अर्थव्यवस्था भले ही सुस्ती के दौर से गुजर रही हो, पर मौजूदा वर्ष में हमारे यहां की कई बड़ी कंपनियों में सीईओ का सालाना वेतन 20 करोड़ रुपए से अधिक है।
स्विस रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन में बताया गया है कि इस समय देश में 1.82 लाख लोग करोड़पति हैं। साल 2018 तक यह बढ़कर 3.02 लाख तक पहुंच जाएगी।
करोड़पतियों की संख्या की दृष्टि से दुनिया में भारत 12वें स्थान पर है। हुरून इंडिया रिच लिस्ट, 2013 के अनुसार मुकेश अंबानी देश के सबसे अमीर भारतीय हैं। उनके पास 1,162 अरब रुपए की संपत्ति है।
दअसल, भारत में कॉरपोरेट जगत और आम लोगों के बीच विकास के लाभ वितरण में भारी असमानता है। इससे आम आदमी में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
इस समय देश में कॉरपोरेट जगत छलांगें लगा रहा है और बड़ी कंपनियों से सीईओ खूब कमाई कर रहे हैं। पर इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि छोटे कर्मचारियों के मामूली वेतन, बेरोजगारी, बढ़ती भुखमरी के कारण कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व आज जरूरत बन गई है।
अक्तूबर, 2011 में वॉल स्ट्रीट पर कब्जे के साथ अमेरिका से शुरू हुआ कॉरपोरेट जगत के खिलाफ लोगों का आंदोलन दुनियाभर के जिन 80 देशों में फैल चुका है, उनमें भारत भी शामिल है।
भारत में आंदोलनकारियों का कहना है कि कॉरपोरेट क्षेत्र के एक फीसदी लोग बाकी 99 फीसदी का शोषण कर रहे हैं।
ऐसे में देश के कॉरपोरेट जगत की नैतिक प्रतिबद्धता और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी सीएसआर पर बहस चल रही है।
यह साफ है कि सीएसआर किसी तरह का दान नहीं है। दरअसल, यह सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ कारोबार करने की व्यवस्था है।
कॉरपोरेट जगत की जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय समुदाय और समाज के विभिन्न वर्गों के बेहतर जीवन के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएं।
अमेरिका और यूरोपीय देशों में बिल गेट्स और कॉरपोरेट जगत के कई ख्यातिप्राप्त सीईओ ने अपने धन स्वेच्छापूर्वक परोपकार में लगाने का जो ‘द गिविंग प्लेज’ अभियान शुरू किया है, उसे भारत में भी बढ़ना जरूरी है।
भारत में भी कॉरपोरेट जगत के कुछ नामचीन लोगों ने सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकार की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं।
अजीम प्रेमजी ने दो चरणों में विप्रो के 20.7 फीसदी शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को हस्तांतरित कर दिए। दुबई की शोभा डेवलपर्स के प्रवर्तक पीएनसी मेनन ने ऐलान किया है कि वह अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा परोपकार के लिए दान करेंगे।
इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की पत्नी रोहिणी नीलेकणि ने परोपकार के लिए अपने 5,77,000 शेयर 160 करोड़ रुपए में बेच दिए।
एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए प्रमुख परोपकारी व्यक्तियों की 2013 की सूची में शामिल 48 लोगों में से चार भारतीय- किरण मजूमदार, एनपीसी मेनन, विनीत नायर और रूनी स्क्रूवाला हैं।
इतना ही नहीं, भारत के बड़े अमीरों के की तरफ से 2010 में उनकी घरेलू बचत का 2.3 फीसदी सामाजिक उत्तरदायित्व की पूर्ति में खर्च हो रहा था। यह आंकड़ा 2012 में बढ़कर 3.5 फीसदी हो गया है।
हालांकि लंबे समय से भारत के बड़े कारोबारी घराने मंदिरों, धर्मशालाओं और दवाखानों में भारी धन खर्च करते रहे हैं, पर अब सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत नए कदम जरूरी हैं।
ये कदम प्रमुख रूप से आम आदमी के बेहतर जीवन स्तर और नई पीढ़ी को मानव संसाधन बनाने से संबंधित होने चाहिए।
साथ ही नई पीढ़ी को प्रतिभा सम्पन्न बनाकर पेशेवर के रूप में तैयार करना प्रमुख आर्थिक-सामाजिक जरूरत है। हर साल देश में केवल सात फीसदी विद्यार्थी ही पेशेवर बन पा रहे हैं।
सरकारी क्षेत्र में अच्छे संस्थानों की कमी इसका प्रमुख कारण हैं। सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र में पेशेवर शिक्षा के जो गिने-चुने संस्थान हैं भी, वहां शुल्क बहुत ज्यादा है।
अभी सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकार पर खर्च की जाने वाली कुल राशि का मात्र सात फीसदी ही शिक्षा पर खर्च हो रहा है। इसे दो-तीन गुना किए जाने से नई पीढ़ी भारी लाभान्वित होगी।
दिसंबर, 2012 में कंपनी बिल 2011 को लोकसभा में स्वीकृति मिलने के बाद अब नए वित्तीय वर्ष से पांच करोड़ रुपए से अधिक लाभ कमाने वाली किसी भी कंपनी को सीएसआर कार्यक्रम पर अपने लाभांश का दो प्रतिशत खर्च करना अनिवार्य हो गया है।
इस तरह की कंपनियों को अपने कॉरपोरेट सामाजिक दायित्वों को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष 15,000 करोड़ रुपए से लेकर 20,000 करोड़ रुपए तक खर्च करने के लिए उपलब्ध होंगे।
ऐसे समय में जब देश में कॉरपोरेट विरोधी आंदोलन उठ खड़ा हुआ है, तब इस जगत को यह अवश्य महसूस करना चाहिए कि नई सामाजिक जरूरतों की पूर्ति में कॉरपोरेट जगत के लोगों की व्यक्तिगत और सामूहिक भूमिका आवश्यक हो गई है।
कॉरपोरेट जगत को नैतिक तरीके से काम करने की जवाबदेही भी समझनी होगी। सरकार और बाजार नियामक सेबी को भी निजी क्षेत्र में काम करने वाले सीईओ और अन्य कर्मचारियों की वेतन असमानता को कम करने और उच्चाधिकारियों के वेतन पैकेज में गोपनीयता बरतने की प्रवृत्ति को रोकने पर ध्यान देना चाहिए।
इस परिप्रेक्ष्य में सेबी द्वारा कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों में जल्द ही व्यापक फेरदबल किया जाना चाहिए।