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नई प्रशासनिक संस्कृति का सूत्रधार- टीएसआर सुब्रमण्यम

Fri, 01 Nov 2013 09:39 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
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वर्ष 1998 के 31 मार्च को जब टीएसआर सुब्रमण्यम देश के सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में विदा हो रहे थे, तो उन्हें  अफसोस भी था कि अपने कार्यकाल में वह प्रशासनिक सेवा की 'माई-बाप संस्कृति' को बदल नहीं पाए। यानी प्रशासनिक अधिकारी राजनीतिक आकाओं के सामने 'हाथ बांधकर' खड़े रहने को विवश थे।
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इसी टीस ने उन्हें अपने साथियों के साथ सर्वोच्च अदालत में जनहित याचिका दायर करने को प्रेरित किया, और अब जो फैसला आया है, उसे प्रशासनिक सुधार की दिशा में मील का पत्थर बताया जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों का न सिर्फ कार्यकाल तय हो, बल्कि अब वे राजनीतिक आकाओं के मौखिक आदेश पर अमल नहीं करेंगे। हालांकि सुब्रमण्यम इसे शुरुआत भर मानते हैं, क्योंकि इसकी काट ढूंढना नेताओं के हाथ में है।

जीवन के आठवें दशक में भी वह शासन से कैसे टक्कर ले रहे हैं? इसका जवाब शुरुआती संघर्ष है, जिसने उन्हें कुंदन बना दिया है। 1961 बैच के इस अधिकारी को सबसे पहले राजनीतिक रूप से सक्रिय उत्तर प्रदेश में जिम्मेदारी मिली, जहां प्रशासनिक अमला न सिर्फ नेताओं के सामने निष्क्रिय था, बल्कि भ्रष्टाचार भी बड़े पैमाने पर था। आत्मकथात्मक शैली में लिखी अपनी किताब जर्नी थ्रू बाबूडॉम ऐंड नेतालैंड- गवर्नेंस इन इंडिया में उन्होंने लिखा है कि यहीं काम करते हुए उन्हें प्रशासनिक अधिकारियों की 'लाचारी' का भान हुआ।
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बाद में उनकी यह धारणा मजबूत हुई कि बेवजह किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने और खुला विकल्प नहीं रखने से मुश्किलें आती हैं। लिहाजा उन्होंने खुलकर अपनी राय रखनी शुरू की। शायद इसलिए जब वह जिनेवा के इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर में बतौर सलाहकार पदस्थापित थे, तो उन्होंने अमेरिकी नीतियों और संयुक्त राष्ट्र पर नियंत्रण की उसकी कोशिशों का पुरजोर विरोध किया।

ऐसा नहीं है कि सुब्रमण्यम मात्र प्रशासनिक सुधार ही चाहते हैं। इस बहाने वह आम लोगों को उनके अधिकारों के प्रति सजग करना चाहते हैं। वह कहते हैं कि पश्चिमी देशों की तरह राजनीतिक लापरवाहियों पर हमारे देश की जनता आक्रामक प्रतिक्रिया देने में 'सुस्त' क्यों है। इस फैसले के बाद भी सशक्त नागरिक समाज के सहयोग से उनका 'अघोषित' आंदोलन जारी रखने की एक मुख्य वजह यह भी है।
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