यह उन समुदायों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिनके हितों को ध्यान में रखते हुए संविधान ने ‘हम भारत के लोग’ की परिकल्पना की थी। अब, यह विचार करने का समय है कि क्या 75 वर्षों के बाद भारतीय समाज वास्तव में ‘हम भारत के लोग’ की भावना को अपनाने में सक्षम हुआ है? संविधान ने प्रत्येक नागरिक को वोट देने का अधिकार प्रदान किया, जिससे उन्हें राजनीतिक लोकतंत्र में सक्रिय रूप से भाग लेने और अपने अधिकारों का उचित लाभ उठाने का अवसर मिला। इस प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकों को समानता और न्याय का लाभ प्राप्त होने की संभावना पैदा होती है। यह न्याय संविधान द्वारा परिभाषित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आधारों पर संरचित है, जो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकारों और अवसरों की गारंटी देता है।
बीते 75 वर्षों में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है। इस समग्र विकास में विभिन्न वर्गों, धर्मों और पंथों का समान योगदान रहा है। विशेष रूप से, कई ऐसे समुदाय, जो पहले सामाजिक संरचना में निचले पायदान पर स्थित थे, अब उन्होंने महत्वपूर्ण उन्नति की है, चाहे वह शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व हो या आर्थिक स्थिति के संदर्भ में हो। इसके बावजूद, आज भी कुछ ऐसे समुदाय हैं, जो अपनी सामाजिक-राजनीतिक स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं कर पाए हैं। ये समुदाय आज भी संविधान से अपेक्षाएं लगाए बैठे हैं कि संविधान उनके लिए निर्धारित किए गए समान अवसरों और न्याय के वादे को पूरा करेगा। डॉ. आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में कहा था-‘राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक कि उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो’।
75 वर्षों की अवधि में, कई वंचित समुदायों के लिए अदृश्यता से दृश्यता की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हालांकि, आज भी कई छोटी-छोटी अदृश्य और बिखरी हुई जातियां ऐसी हैं, जो 75 वर्षों के बाद भी अदृश्य बनी हुई हैं। इन्हें अब तक लोकतंत्र के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लाभों से वंचित रखा गया है, क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक पहलू यह भी है कि यह कुछ समूहों को सशक्त बनाती है, जबकि अन्य समूहों को हाशिए पर धकेल देती है। इसका प्रमुख कारण राज्य की शासन व्यवस्था की भाषा और राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई गई वोट बैंक की रणनीतियां हैं। हाशिए पर पड़ी ये अदृश्य जातियां प्रायः आवाजहीन होती हैं। ये समुदाय न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रह जाते हैं, बल्कि राज्य के संसाधनों और विकास प्रक्रियाओं तक उनकी पहुंच भी सीमित हो जाती है।
परिणामस्वरूप, लोकतांत्रिक ढांचे में इनके हितों की लगातार अनदेखी होती है, और ये समुदाय सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से हाशिए पर बने रहते हैं। यह स्थिति संविधान की उस मूल परिकल्पना के विपरीत है, जो सभी समुदायों को समान अवसर और न्याय प्रदान करने का वादा करती है।
भारतीय लोकतंत्र से यह आशा की गई थी कि वह सभी की आवाज सुनेगा और उसकी संरचना में सभी वर्गों की भागीदारी होगी। हालांकि, आजादी के सात दशकों बाद भी यह अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकी हैं। इन अदृश्य समुदायों को 75 वर्षों के बाद भी भारत की चुनावी राजनीति और विकास कार्यक्रमों में लगातार उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। यह स्थिति एक गंभीर सवाल उठाती है कि क्या संविधान द्वारा प्रस्तावित समावेशी समाज का आदर्श सभी वर्गों तक पहुंच पाया है? यह संसद का ऐसा सत्र है, जिसमें संविधान पर चर्चा हो रही है।
ऐसे में हमें उन समुदायों और समूहों की स्थिति पर भी चिंतन करना चाहिए, जो 75 वर्षों की इस यात्रा में राजनीतिक जागरूकता, शिक्षा और नेतृत्व की कमी, साथ ही उनके सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार के कारण पीछे छूट गए हैं। यह वही अदृश्य समुदाय है, जिनके सपनों को पूरा करने के उद्देश्य से हमारे संविधान निर्माताओं ने एक नए लोकतंत्र की स्थापना की थी। उन्होंने पारंपरिक समाज की नींव पर एक आधुनिक, समतामूलक और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया था।
--साथ में पंकज चौरसिया