पिछले दशक में भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में उल्लेखनीय विकास हुआ है। वर्ष 2014 में पांच सौ से कम स्टार्टअप को मंजूरी मिली थी। वहीं 2023 तक यह संख्या बढ़कर 90 हजार तक पहुंच गई, जिनमें सौ से ज्यादा यूनिकॉर्न शामिल हैं। भारत अब अमेरिका और चीन के बाद दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल हो गया है। स्टार्टअप का विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार हुआ है। शुरुआती क्षेत्रों में ई-कॉमर्स और फिनटेक (जैसे फ्लिपकार्ट व पेटीएम) पर फोकस था। हाल ही में एआई, ब्लॉकचेन और रोबोटिक्स का लाभ उठाने वाले डीप-टेक स्टार्टअप के साथ-साथ हेल्थटेक, एग्रीटेक, एडटेक और क्लाइमेट टेक ने भी गति पकड़ ली है।
भारतीय स्टार्टअप अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों को लक्षित कर आगे बढ़ रहे हैं। वार्षिक स्टार्टअप फंडिंग 2014 के दो अरब डॉलर से बढ़कर 2023 में 25 अरब डॉलर से अधिक हो गई। पिछले दशक में संचयी फंडिंग 150 अरब डॉलर को पार कर गई है। फिनटेक सालाना आठ अरब डॉलर आकर्षित करता है, इसके बाद ई-कॉमर्स, एडटेक और हेल्थटेक का नंबर है। जलवायु तकनीक तेजी से बढ़ रही है, फंडिंग 35 फीसदी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रही है।
उद्योग- 2025 : क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई द्वारा संचालित आईटी निर्यात 200 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। हेल्थकेयर बाजार के 372 अरब डॉलर तक बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें टेलीमेडिसिन और प्रिसिजन मेडिसिन अग्रणी हैं। सौर और पवन ऊर्जा में निवेश से 2030 तक भारत के 500 गीगावाट लक्ष्य की ओर विकास होगा। डिजिटल भुगतान अपनाने और ग्रामीण विस्तार के कारण बाजार का आकार 200 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देंगी।
नए अवसर, नई उम्मीदें
एआई, आईओटी और ब्लॉकचेन स्मार्ट सिटी, लॉजिस्टिक्स और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देंगे। फ्रेशवर्क्स और ब्राउजरस्टैक जैसी सफलता की कहानियों के साथ भारतीय स्टार्टअप तेजी से वैश्विक अवसरों की खोज कर रहे हैं। डिजिटल इंडिया और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, जैसी नीतियां नवाचार, वित्त पोषण व सरलीकृत अनुपालन के लिए रूपरेखा प्रदान करती हैं। हालांकि कुछ चुनौतियां भी हैं। शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग कमजोर है, जो नवाचार को दबा रहा है। अमेरिका के विपरीत, भारतीय विश्वविद्यालय शायद ही कभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य समाधान पेश करते हैं। भारत अपनी जीडीपी का केवल 0.65 फीसदी अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है, जबकि अमेरिका का 2.8 फीसदी है।
वहीं, अमेरिका में 25 फीसदी से अधिक स्टार्टअप अकादमिक अनुसंधान से उत्पन्न होते हैं, जबकि भारत में मजबूत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र का अभाव है। एनईपी 2020 के अंतर्गत अनुसंधान केंद्रित शिक्षा को प्रोत्साहित करना और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना करना और इन्क्यूबेशन केंद्रों व विश्वविद्यालय-उद्योग भागीदारी को बढ़ावा देना शामिल है। वहीं, हमारे यहां उद्यम के विफल होने को कलंक के रूप में देखा जाता है, जबकि सिलिकॉन वैली में इसका जश्न मनाया जाता है। इसके अलावा, प्रतिभाशाली नवप्रवर्तक बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। ऐसे में, शिक्षा-उद्योग सहयोग को मजबूत करने की जरूरत है। संयुक्त शोध प्रयोगशालाएं स्थापित हों, विश्वविद्यालय संचालित स्टार्टअप को प्रोत्साहन मिले। शोध एवं विकास के लिए फंडिंग बढ़ाएं। ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित स्टार्टअप को प्रोत्साहन मिले। कुल मिलाकर, भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम तकनीकी प्रगति, वैश्विक विस्तार व सरकारी समर्थन से प्रेरित होकर 2025 तक पर्याप्त वृद्धि के लिए तैयार है। नवाचार संस्कृति, अकादमिक-उद्योग साझेदारी को और वैश्विक बाजार पहुंच का विस्तार करके भारत 2025 में वैश्विक नवाचार पावरहाउस में बदल सकता है।
अमेरिका से तुलना
अमेरिका सालाना 300 अरब डॉलर आकर्षित करता है, जो भारत से 12 गुना अधिक है। लेकिन, भारत की स्टार्टअप फंडिंग अमेरिका की 8-10 फीसदी की तुलना में 25-30 फीसदी की तेज दर से बढ़ी है। साथ ही अमेरिका डीप-टेक और जीवन विज्ञान में उत्कृष्ट है, जबकि भारत फिनटेक और उपभोक्ता-उन्मुख क्षेत्रों में हावी है।
आईआईआईटी ऊना व नागपुर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन