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पटरी पर लौटते रिश्ते

भास्कर साई
Updated Thu, 17 Sep 2015 07:50 PM IST
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इस वर्ष के प्रारंभ में मैत्रीपाला सिरिसेना ने महिंदा राजपक्षे को हराकर जब श्रीलंका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तब यह उम्मीद जगी कि भारत के साथ श्रीलंका के रिश्ते में सकारात्मक बदलाव आएगा। एक और बड़ी उम्मीद यह थी कि श्रीलंका में रह रहे तमिलों के मुद्दे पर दोनों पड़ोसी देशों में सहमति बनेगी, जो न सिर्फ श्रीलंका, बल्कि दक्षिण भारत, और खासकर तमिलनाडु के लिए एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। हाल ही में जब रानिल विक्रमसिंघे वहां के प्रधानमंत्री बने, तो उम्मीदें दोगुनी हो गईं, क्योंकि वह भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाने के हिमायती और नैतिक मुद्दे पर अपने नरम दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। यह उम्मीद तब और बढ़ गई, जब तमिल नेशनल एलायंस के नेता आर संपतन की श्रीलंकाई संसद में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नियुक्ति ने वहां के तमिलों को हर्षित कर दिया। इसका तमिलनाडु के कई राजनीतिक नेताओं ने स्वागत किया।


हालांकि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, खूनी संघर्ष के दौरान वहां भयावह रूप से मानवाधिकार का हनन हुआ, जिसमें बड़े पैमाने पर नरसंहार, दसियों हजार लोगों के लापता होने और यौन हिंसा की घटनाएं शामिल हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद रानिल विक्रमसिंघे की पहली भारत यात्रा के समय आई इस रिपोर्ट ने तमिलनाडु में हंगामा खड़ा कर दिया है। बीते हफ्ते तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि वह कूटनीतिक प्रयासों से अमेरिका को श्रीलंका का समर्थन करने से रोके। राज्य की मुखिया जे जयललिता द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव में मोदी सरकार से अनुरोध किया गया है कि वह उस युद्ध अपराध की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच सुनिश्चित करे। प्रस्ताव पारित होने के कुछ ही घंटों बाद जयललिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया कि प्रस्ताव के आधार पर वह तत्काल जरूरी कदम उठाएं।


भारत ने श्रीलंका से कहा है कि वह तमिलों की आकांक्षाएं पूरी करने के लिए सत्ता हस्तांतरण के 13वें संशोधन को लागू करे। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कथित युद्ध अपराध की जांच के लिए विशेष अदालत बनाने की मांग की गई है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय जज शामिल होंगे। अब लोगों की निगाहें आगामी एक-दो अक्तूबर की बैठक पर लगी है कि जब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर चर्चा होगी और अंतिम प्रस्ताव पारित किया जाएगा, तब भारत का रुख क्या रहता है। भारत का रुख ही दरअसल भविष्य में कई चीजों की दिशा निर्धारित करेगा, जिसमें श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा, भारत-श्रीलंका संबंध और तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य भी शामिल हैं।


इस तरह से श्रीलंका का मुद्दा तमिलनाडु में एक बार फिर गरमा जरूर गया है। लेकिन यह देखने की बात है कि दोनों देश अब एक दूसरे के ज्यादा नजदीक आ रहे हैं। विगत फरवरी में राष्ट्रपति बनने के बाद मैत्रीपाला सिरिसेना भारत आए थे। उसके बाद मार्च में नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की थी। और अब प्रधानमंत्री बनने के बाद रानिल विक्रमसिंघे ने पहले विदेश दौरे के तौर पर भारत को चुना। यही नहीं, नई दिल्ली में दोनों प्रधानमंत्रियों ने दोतरफा रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। दोनों कह रहे हैं कि वे एक-दूसरे के सुरक्षा हितों को समझते हैं और एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति संवेदनशील हैं।


भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नई दिल्ली में रानिल विक्रमसिंघे की कई मुद्दों पर बातचीत हुई, जिनमें तमिलों को समान अधिकार, व्यावसायिक भागीदारी और श्रीलंका में चीन-समर्थित परियोजनाएं शामिल थीं। जिन समझौतों पर दस्तखत हुए, उनमें भारत द्वारा श्रीलंका में छोटी विकास परियोजनाओं में मदद करने, चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति करने, श्रीलंका में एक आर्थिक जोन के निर्माण में सहायता करने और त्रिंकोमाली तेल टैंक की मरम्मत में मदद करने का भरोसा दिया गया है। दोनों देश शांति और स्थायित्व चाहते हैं, आतंकवाद से मुकाबला करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं और एक दूसरे की समुद्री सीमा में आ जाने वाले मछुआरों की सुरक्षा के प्रति भी गंभीर हैं। मछुआरों का मुद्दा दोनों देशों के लिए संवेदनशील विषय है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर सहमति जताई है कि दोनों देशों का मछुआरा संघ इसका समाधान तलाशने के लिए निरंतर प्रयास करे। उनका मानना है कि इस मसले को मानवीय और जीविका को प्रभावित करने वाले मुद्दे की तरह देखा जाना चाहिए। भारतीय मछुआरों को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए भी कदम उठाया जा रहा है।


नई दिल्ली का मानना है कि कोलंबो की नई सरकार 'सही दिशा' में आगे बढ़ रही है और जब पर्यावरण सहित विभिन्न मानदंडों पर परियोजनाओं के आकलन की बात आएगी, तो वह 'निर्धारित मानकों' का पालन करेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि 'हम अपने परस्पर जुड़े सुरक्षा हितों और एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति संवेदनशील बने रहने की जरूरत को समझते हैं। हम दोनों देश अपने रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को और बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराते हैं। इसी तरह श्रीलंकाई प्रधानमंत्री ने अपने यहां संविधान के तहत सत्ता का बंटवारा करने का आश्वासन दिया है।


बहरहाल भारत को उम्मीद है कि पड़ोसी देश 'वास्तविक मैत्री' और विकास के लक्ष्य को हासिल करेगा, ताकि वहां के लोग, जिसमें तमिल समुदाय भी शामिल है, 'एकजुट श्रीलंका में समानता, न्याय, शांति और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।'
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-लेखक चेन्नई स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं
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