देश के मौजूदा राष्ट्रपति एवं सबसे लंबे समय तक वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि बाजार से ज्यादा जरूरी है, गरीब की रोटी। उन्होंने व्यापार सुगमता समझौता (टीएफए) और खाद्य सुरक्षा को आपस में जुड़ा हुआ बताया और विकसित राष्ट्रों से अपील की कि टीएफए पर हस्ताक्षर न करने के भारत के फैसले को पश्चिमी देश गलत न समझें। उन्होंने कहा कि भारत ने केवल अपनी मांग मनवाने का प्रयास किया है कि उसकी खाद्य सुरक्षा को भी व्यापार सुगमता समझौते में शामिल किया जाए, जैसा कि बाली समझौता, 2013 में तय किया गया था। टीएफए के तहत 160 सदस्य देशों के बीच आयात एवं निर्यात के लिए सीमा शुल्क के नियमों को अधिक सुविधाजनक बनाने पर समझौता होना है।
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के महानिदेशक का कहना है कि यद्यपि यह मामला उलझा हुआ है, किंतु अब खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण पर व्यापक सहमति बनती दिख रही है। डब्ल्यूटीओ के महानिदेशक ने यह बात जेनेवा ट्रेड नेगोसिएशन कमेटी की बैठक के दौरान कही, जो भारत के लिए एक शुभ संकेत है।
भारत पर टीएफए पर दस्तखत करने का दबाव है। प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान बराक ओबामा ने इस विषय पर चर्चा करके इसे और गंभीर बना दिया है। विश्व बैंक के महासचिव भी भारत सरकार और वाणिज्य मंत्रालय पर निरंतर दबाव बनाए हुए हैं। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर अरविंद सुब्रह्मण्यम की नियुक्ति ने किसान समर्थकों को गंभीर चिंता में डाल दिया है, क्योंकि इस पद पर नियुक्ति से पूर्व वह सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। अब डर है कि वह डब्ल्यूटीओ में भारत के रुख को नरम कर सकते हैं, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पाद के समर्थन मूल्य की नीति पर प्रभाव पड़ेगा, जो किसान विरोधी होगा।
विभिन्न सरकारों की नीतियों ने पहले ही किसानों का काफी अहित किया है, जैसे केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा दिए जाने वाले (समर्थन मूल्य के अतिरिक्त) बोनस को रोकने का फैसला किया है। नतीजतन लाभकारी मूल्य के बजाय न्यूनतम मूल्य मिलना भी असंभव हो गया है। शायद ही किसी सरकार ने चुनावी वायदों पर इतनी जल्दी पैंतरा बदला हो! चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने किसानों को लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य देने की बात की थी।
टीएफए के अलावा भारत पर अमेरिका द्वारा पेटेंट कानूनों में बदलाव का भी दबाव बनाया जा रहा है, जिससे जीवनरक्षक दवाइयों की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी। प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे से पूर्व केंद्र सरकार ने बौद्धिक संपदा अधिकार नीति की समीक्षा करने का फैसला किया। उनकी अमेरिका यात्रा के बाद कुछ जीवनरक्षक दवाइयों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हैरान करने वाली है। देश का मौजूदा बौद्धिक संपदा अधिकार कानून यह सुनिश्चित करता है कि दवाओं का कोई भी पेटेंट धारक पेटेंट का दुरुपयोग करके एकाधिकार द्वारा अधिक कीमत वसूल नहीं सकता। परंतु अब आशंका है कि विदेश से निवेश लाने के लालच में भारत आईपीआर में बदलाव का दबाव स्वीकार कर लेगा। संघ विचारधारा की आर्थिक नीतियों का प्रवक्ता माना जाने वाला स्वदेशी जागरण मंच भी वैश्वीकरण की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ है।
अगर मनरेगा व खाद्य सुरक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाओं को सरकार ने कमजोर बनाया, तो यह विरोध और बढ़ेगा। भारत जैसे विशाल देश में एक बड़े तबके के लिए कृषि जीविका का साधन है, जबकि डब्ल्यूटीओ का रुख खाद्य सुरक्षा पर काफी नकारात्मक है।
(लेखक राज्यसभा के सदस्य और जद (यू) के प्रवक्ता हैं)