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भारत-सऊदी अरब संबंध: खरीदार से साझेदार, आर्थिक कॉरिडोर पर बनी सहमति देती है मजबूत रिश्तों की गवाही

अनिल त्रिगुणायत
Updated Sat, 16 Sep 2023 07:34 AM IST

सार

भारत पहले सऊदी अरब से कच्चा तेल खरीदता था, पर अब वह हमारा महत्वपूर्ण साझेदार है। जी-20 के शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप तक आर्थिक कॉरिडोर पर बनी सहमति भारत-सऊदी अरब के मजबूत होते रिश्ते का ही प्रमाण है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सऊदी के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला


गौरतलब है कि सऊदी अरब भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार (अमेरिका, चीन और यूएई के बाद) है, जबकि भारत, सऊदी अरब के लिए दूसरा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। यह स्थिति हमेशा से नहीं थी। पहले दोनों देशों के बीच संबंधों का आधार कुल जमा इतना था कि भारत, सऊदी अरब से तेल खरीदता था। इन संबंधों में रणनीतिक कुछ भी नहीं था, लेकिन अब चीजें बदल रही हैं।


दरअसल, 2020 में जब सऊदी अरब में जी-20 सम्मेलन हुआ था, तब कोविड से पूरी दुनिया जूझ रही थी, उस दौर में भारत ने सऊदी अरब का पूरा साथ दिया था। इसी तरह, भारत में हुए जी-20 सम्मेलन में सऊदी अरब ने भारत का समर्थन किया। आज, चाहे पाकिस्तान के साथ कश्मीर का मुद्दा हो, या फिर अनुच्छेद-370 को हटाए जाने का मुद्दा हो, सऊदी अरब इन्हें अब भारत का अंदरूनी मामला ही बताता है। इससे यह भी पता चलता है कि सऊदी अरब और भारत के साथ रिश्ते अब आर्थिक के साथ-साथ रणनीतिक मोर्चे पर भी मजबूत हो रहे हैं।


भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (आईएमईसी) की स्थापना को लेकर हुए समझौता वार्ता भी दोनों रिश्तों के मजबूत होते रिश्तों का ही प्रमाण है। आईएमईसी दरअसल, एक ऐतिहासिक व अभूतपूर्व पहल है, जो वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी को नया आकार देने की बात करती है। इसमें भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ, इटली, जर्मनी और अमेरिका शामिल हैं। यह कॉरिडोर, दरअसल, इन देशों के बीच व्यापार का एक वैकल्पिक मार्ग है। इससे इन देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ेगी और निवेश भी बढ़ेगा। इस परियोजना के तहत पश्चिम एशिया में स्थित देशों को एक रेल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जिसके बाद उन्हें भारत से एक शिपिंग रूट के माध्यम से जोड़ा जाएगा। फिर इस नेटवर्क को यूरोप से जोड़ा जाएगा।


फिलहाल भारत या इसके आसपास मौजूद देशों से निकलने वाला माल स्वेज नहर से होते हुए भूमध्य सागर पहुंचता है, जिसके बाद वह यूरोपीय देशों तक पहुंचता है। इसी तरह, अमेरिकी महाद्वीप में स्थित देशों तक जाने वाला माल भूमध्य सागर से होते हुए अटलांटिक महासागर में प्रवेश करता है, जिसके बाद वह अमेरिका, कनाडा या लैटिन अमेरिकी देशों तक पहुंचता है। इस व्यापक परियोजना से पूरी दुनिया को फायदा मिलेगा। अभी हालांकि यह परियोजना विचार के स्तर पर ही है। पर हर बड़ी परियोजना की शुरुआत विचार से ही होती है।


इस परियोजना को चीन की बेल्ट व रोड पहल (बीआरआई) का कूटनीतिक जवाब भी माना जा रहा है। इसके जरिये दुनिया के अन्य देशों को यह संदेश भेजा जा रहा है कि अपने विकास मॉडल को चुनने के लिए आईएमईसी के रूप में बीआरआई का एक और विकल्प मौजूद है। चीन की बीआरआई में कई कमियां हैं। यह पारदर्शी नहीं है और देशों की संप्रभुता का ख्याल नहीं करती। इससे विभिन्न देशों के रणनीतिक हित भी प्रभावित होते हैं। बीआरआई की तुलना में आईएमईसी मार्ग से व्यापार में कम समय लगेगा। आईएमईसी से वैश्विक व्यापार को विकल्प उपलब्ध होंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। सैद्धांतिक तौर पर आईएमईसी इसलिए बेहतर है, क्योंकि इससे व्यापार बाधाएं हटेंगी, और व्यापार बेहतर बनेगा।


इसके अलावा, भारत और सऊदी अरब ने भारत-खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की है, ताकि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत किया जा सके।  सऊदी अरब के साथ अच्छे रिश्ते भारत के लिए जीसीसी के सदस्य देशों के साथ बेहतर संबंधों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जीसीसी के भीतर कुछ समस्याएं चल रही हैं। इसलिए, उसने भारत के साथ एफटीए की सभी वार्ताएं रोकी हुई हैं। भारत ने भी एफटीए को लेकर हुई वार्ताओं को आगे बढ़ने से रोका है। इसकी वजह यह थी कि इससे पहले भारत के जिन देशों के साथ एफटीए हुए थे, उनमें उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है।
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भारत ने उन सभी की समीक्षा की और उसके बाद सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात के साथ 2022 में कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक सहयोग समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए। सीईपीए संयुक्त अरब अमीरात की ऐसी पहली साझेदारी है और जीसीसी के क्षेत्र में भारत का इस तरह का पहला समझौता है। सीईपीए के शुरू होने के बाद से भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब इसी पैटर्न पर भारत व जीसीसी के मध्य एफटीए का मार्ग प्रशस्त होने की संभावनाएं बढ़ी हैं। अगर भारत और जीसीसी के मध्य मुक्त व्यापार समझौता होता है, तो इससे भारत के लिए करों में कमी होगी, या, उसे वरीयता मिलेगी या कर की दरें शून्य होंगी। तीनों ही स्थितियां भारत के लिए फायदेमंद होंगी।


भारत और सऊदी अरब के संबंधों में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भी एक मुद्दा है। 2010 के रियाद घोषणापत्र में सऊदी अरब ने पहली बार आतंकवाद को एक गंभीर वैश्विक खतरा माना था। मुस्लिमों के लिए पवित्र मक्का सऊदी अरब में ही है। और अगर वह आतंकवाद की निंदा करता है, तो इसका संदेश पूरे मुस्लिम समुदाय को जाता है। भविष्य में दोनों देशों के मध्य अंतरिक्ष, सुरक्षा, पर्यावरण व क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना है।


अंतरिक्ष क्षेत्र में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात काफी तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत भी इस क्षेत्र में जिस तरह से विकास कर रहा है, उससे अंतरिक्ष के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, ये देश मिलकर अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अगला संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यूएई में होना है, जिसके लिए भारत पूरा समर्थन देने के लिए तैयार है। पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के निरंतर विकसित हो रहे संबंध सहयोग के नए क्षेत्र खोलेंगे। इससे इन देशों में रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ेगी। अगर विश्व में शीतयुद्ध 2.0 जैसी स्थितियां बनती हैं, तो भारत और पश्चिम एशियाई देश मिलकर पूरी दुनिया को एक नई दिशा दिखलाएंगे।

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