फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

अफगानिस्तान में भारत का रुख और स्थायी शांति की तलाश

चयनिका सक्सेना Published by: चयनिका सक्सेना Updated Wed, 28 Aug 2019 06:27 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना - फोटो : a

पिछले अट्ठारह वर्षों में अफगानिस्तान में हालात उतने ही कठिन रहे हैं, जितने तीन दशक पहले थे। वास्तव में 2017 के बाद से चीजें नहीं बदली हैं, जब चरमपंथियों को खत्म करने के लिए नांगरहार में काफी शक्तिशाली बम गिराया गया था, जिसे कथित रूप से 'मदर-ऑफ-ऑल-बम' कहा जाता है। या जब 2001 में 25 अंतरराष्ट्रीय हितधारक एकजुट होकर 'अफगानियों को अपने देश में संघर्षों को समाप्त करने में मदद देने और राष्ट्रीय सुलह, स्थायी शांति, स्थिरता व मानवाधिकारों के सम्मान को बढ़ावा देने तथा अफगानिस्तान को आतंकवादियों की आधार भूमि के रूप में उपयोग को समाप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित हुए थे।'



1970 के दशक के बाद से अफगानिस्तान में बहुत-सी चीजें गलत हुई हैं। हालांकि हाल के दिनों में अमेरिका ने खुद को इन सब परेशानियों के केंद्र में पाया, जिनमें से कई उसने खुद पैदा की हैं। इसके काफी सबूत मौजूद हैं, जो बताते हैं कि अमेरिकी नीतियां और कार्रवाई अफगानिस्तान की मांग और आकांक्षाओं पर रणनीतिक रूप से खरी नहीं उतरी हैं। यह उसके गलत इरादे या तानाशाही व्यवहार को नहीं दिखाता, बल्कि यह दिखाता है कि उसने आतंकवाद विरोधी अभियानों को कितने बेमन से चलाया, जो अब भी जारी है।


हाल में अमेरिका ने वहां शांति और सुलह प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है, जो न्याय और जवाबदेही के उसके अपने रुख के विपरीत है। अमेरिकी सेना और खुफिया तंत्र द्वारा अफगान धरती पर मानवता के खिलाफ किए गए कथित अपराधों की एक बड़ी जांच हो सकती थी, लेकिन अमेरिका ने इससे बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) में अपना रुख बदल दिया। आईसीसी के खिलाफ प्रतिशोध की धमकी देकर और आईसीसी के मुख्य अभियोजक फाटोउ बेनसौदा का वीजा रद्द करके उसने अपने और अपने सहयोगियों के खिलाफ प्रस्तावित जांच को रद्द करना सुनिश्चित कर लिया, जबकि कथित अपराधों के सिलसिले में 11.7 लाख बयान अदालत में प्रस्तुत किए गए थे। अमेरिका ने समय-समय पर अस्थिर और विरोधाभासी रवैये का प्रदर्शन किया है, पर अफगान सुलह के विशेष अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खालिजाद ने थोड़ा आत्मविश्वास दिखाया है। अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकलता चाहता है और उसे निकलना भी चाहिए, लेकिन उसे पता नहीं है कि कैसे निकलना है। अफगानिस्तान के प्रति भारत के रुख में एक बदलाव दिखाई देता है। जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद इसके बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं। जम्मू-कश्मीर का आंतरिक पुनर्गठन सिर्फ घरेलू व्यवस्था को दुरुस्त करना ही नहीं था, बल्कि उसके निहितार्थ अधिक हैं। कहा जाता है कि जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति में बदलाव के लिए भारत के पास भू-राजनीतिक कारण मौजूद थे, हालांकि उसे इसका भी एहसास था कि उसके इस कदम से द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय लहरें पैदा हो सकती हैं।


भारत के लिए अपनी सारी ऊर्जा एक ही तरफ लगा देना रणनीतिक समझदारी नहीं थी, खासकर तब, जब अन्य क्षेत्रीय शक्तियां, खासकर रूस और ईरान ने अफगानिस्तान में विभिन्न स्रोतों से संपर्क बढ़ाया है। एक तरफ मुख्यधारा की राजनीति की घटती विश्वसनीयता और दूसरी तरफ तालिबान की बढ़ती वैधता मांग करती है कि भारत अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाए। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी अफगानिस्तान के दूसरे भाइयों यानी तालिबान तक पहुंचने के लिए भारत को विवेकपूर्ण मार्ग प्रदान किया था।


हालांकि देर से ही सही, लगता है कि भारत ने अपने रवैये में परिवर्तन किया है। इसे पूर्व विदेश मंत्री (दिवंगत) सुषमा स्वराज के मई, 2019 में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में दिए गए भाषण में देखा जा सकता है। एक स्थिर अफगानिस्तान को देखने की भारत की इच्छा दोहराते हुए उन्होंने कहा था कि 'भारत किसी भी प्रक्रिया के लिए प्रतिबद्ध है, जो उस देश के पुनर्विकास में सहायता कर सकता है।' यह उस देश के रुख में एक अहम बदलाव था, जो यह चाहता था कि शांति प्रक्रिया 'अफगान के नेतृत्व वाली, अफगान के स्वामित्व वाली, और अफगान नियंत्रित' हो।


अफगान शांति समझौते की पृष्ठभूमि में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अमेरिका बुलाने से ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति बिल्कुल स्पष्ट हो गई है। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक स्तर पर फिर से जुड़ाव को लेकर भारत के आशंकित होने के कारण थे। संभवतः ट्रंप की अवांछित मध्यस्थता के प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में ही भारत ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का कदम उठाया।


फिर भी कश्मीर की बागडोर अपने हाथ में लेने का यह भारत का प्रयास है। राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर सिर्फ घाटी में शांति बनाए रखने के लिए ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान से कश्मीर को अलग करने के लिए भी था, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान अक्सर इस क्षेत्रीय खेल में भारत को बाहर रखने के लिए करता था। पाकिस्तान द्वारा अपने रुख पर अड़े रहने के चलते भारत तालिबान तक परोक्ष पहुंच बनाने के लिए तैयार हो गया।
विज्ञापन


हाल ही में अफगानिस्तान ने एक बयान जारी कर दूसरे देशों से कहा है कि कश्मीर के मौजूदा मुद्दे को अफगानिस्तान से न जोड़ा जाए। उसके इस बयान की दो अलग-अलग व्याख्या की गई है। एक तरफ इसे भारत को निर्देशित बताया जा रहा है, जो अफगानिस्तान में पाकिस्तान को पछाड़ने के लिए अपना कदम बढ़ाता प्रतीत होता है, जिससे अनजाने में कश्मीर को तालिबान से जोड़ा जाएगा। दूसरी ओर इसे भारतीय रुख में बदलाव की प्रस्तावना की तरह पढ़ा जा रहा है, जो दर्शाता है कि तालिबान के साथ संलग्नता की प्रक्रिया संभवतः पहले से चल रही है।


जैसे कि शांति समझौता पहले से ज्यादा वास्तविक लगता है, भारत के लिए यह सलाह है कि वह पहले की तरह अलग न रहे। अफगानिस्तान की स्थिति को अक्सर रेत पर लकीर खींचने की तरह वर्णित किया जाता है, जो परिवर्तित होती रहती है। भारत को इस खेल में फुर्तीला बने रहने की जरूरत है, यह जानते हुए कि उसे काफी सावधान रहना है, क्योंकि स्थिति बदल सकती है। हालांकि अफगानिस्तान में जो उसने सद्भावना पैदा की है, उसे देखते हुए यह भरोसा किया जा सकता है कि भारत के रुख में बदलाव का व्यापक अफगान आबादी द्वारा स्वागत किया जाएगा।


-लेखिका नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में शोध कर रही हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next