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बदलते नेपाल में भारत का हित

मनोज जोशी Updated Tue, 19 Dec 2017 06:24 PM IST
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नेपाल में नई सरकार
आखिरी समय की कुछ हिचक के बाद यह तय है कि नेपाल में जल्द ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) का गठबंधन सत्ता संभाल लेगा। हालांकि शेर बहादुर देउबा की अगुआई वाली नेपाली कांग्रेस की निवर्तमान सरकार सत्ता हस्तांतरण में कुछ देर कर रही है, लेकिन दीवार पर लिखी इबारत बहुत स्पष्ट है।


हाल के चुनावों में एमाले और माओवादी सेंटर को मिली भारी जीत को लेकर जरा भी संदेह नहीं किया जा सकता है। कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा की 165 सीटों में से 116 पर जीत दर्ज की है। ये सभी एकल सीट वाले क्षेत्र हैं। गठबंधन को 46.91 फीसदी वोट मिले हैं, जिससे आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली 110 सीटें तय होंगी।


संसद के उच्च सदन यानी राष्ट्रीय सभा में कुल 59 सीटें हैं, जिनमें से तीन सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे, जबकि बाकी सीटों का निर्वाचन सात प्रांतों से होगा। जिसमें छह प्रांतों में भी कम्युनिस्ट गठबंधन ने जीत दर्ज की है और उसे प्रांतीय एसेंबली की कुल 241 सीटें मिलीं, जबकि 41 सीटें नेपाली कांग्रेस को और 47 सीटें अन्य को मिली हैं। 


जनादेश की यह निर्णायक प्रकृति नेपाल के लिए अच्छी खबर है, जहां अब ऐसी सरकार बनेगी, जिसे दो वर्षों तक हटाया नहीं जा सकता। सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होने की वजह से वहां स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है।


इस पर गौर किया जा सकता है कि 2008 में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल की स्थापना के बाद से देश अब तक दस प्रधानमंत्री देख चुका है, जिससे वहां की विखंडित राजनीति का पता चलता है। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां अब कह रही हैं कि वे आपस में विलय कर लेंगी।


हालांकि विलय पर बात करना उस पर अमल करने से कठिन है। इन दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों में जो सैद्धांतिक दरारें हैं, उन्हें भरना आसान नहीं है। ओली और प्रचंड दोनों ही ताकतवर और सक्षम नेता हैं। अब या तो वे आपस में मिलकर एक मजबूत सरकार दे सकते हैं या फिर उनमें टकराव हुआ, तो देश राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ जाएगा। 


तराई क्षेत्र के लोगों ने जिन्हें मधेस के रूप में भी जाना जाता है, उत्साह के साथ चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि उनका कहना है कि संविधान का झुकाव उनकी तुलना में पहाड़ी क्षेत्र के प्रबुद्ध वर्ग की ओर अधिक है। चाहे जिस वजह से भी प्रमुख मधेसी पार्टियों- राष्ट्रीय जनता पार्टी और संघीय समाजवादी पार्टी ने एक दूसरे को नुकसान पहुंचाया।
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इससे दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भेदभाव का मुद्दा कमजोर पड़ गया। नई सरकार को इस क्षेत्र को साथ लेकर चलना होगा, ताकि नेपाल और भारत के बीच संचार बेहतर रिश्ते हों, अन्यथा वहां फिर से अस्थिरता का दौर शुरू हो सकता है। 


नेपाल विगत दो दशकों से राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। पहले उसे माओवादी हिंसा का सामना करना पड़ा, जिसमें तकरीबन 20,000 लोगों को जान गंवानी पड़ी, उसके बाद लंबी राजनीतिक उठा-पटक चली। 2015 में आए भूकंप ने वहां भारी तबाही मचाई, जिससे संपत्ति के साथ ही मनोवैज्ञानिक नुकसान भी हुआ। यह उम्मीद की जा रही था कि नेपाली संविधान के अमल में आने के बाद वहां स्थिरता आएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 


तराई में रहने वाले मधेसी समूहों ने संविधान को पक्षपातपूर्ण बताते हुए भारत को जोड़ने वाली सड़कों को लंबे समय तक बाधित कर दिया था। हालांकि नेपाल के प्रबुद्ध तबके ने इस नाकेबंदी के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया, जिसके कारण वहां भूकंप से प्रभावित इलाकों में दवा, ईंधन और भवन निर्माण सामग्री की आपूर्ति बाधित रही।


नेपाल के लिए वास्तव में सबसे बड़ा मुद्दा है कि वहां सरकार प्रभावी तरीके से अपना काम करना शुरू करे। नेपाल को लंबे समय से खराब प्रशासन और गरीबी से जूझना पड़ रहा है। इसके साथ ही उसे अपने दो ताकतवर पड़ोसियों चीन और भारत के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा। 


यह लगभग तय दिख रहा है कि नई सरकार देउबा सरकार के उस फैसले को पलट देगी, जिसमें उसने एक विशाल पनबिजली परियोजना का चीनी कंपनी को दिया गया ठेका रद्द कर दिया था। इसके तहत बूढ़ी गंडकी नदी पर एक बड़ा बांध भी बनना है।


नवंबर, 2017 में देऊबा सरकार ने कहा था कि इस परियोजना को नेपाल के चीन के वन बेल्ट-वन रोड प्रोजेक्ट में शामिल होने के फैसले के फलस्वरूप मंजूरी दी गई थी, लेकिन इसे कंपनी की कथित अनियिमितता की शिकायतों के कारण रद्द कर दिया गया। 


नेपाल के संदर्भ में चीन बनाम भारत का परिदृश्य अतिरंजित तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। ओली और प्रचंड दोनों ही प्रधानमंत्री पद पर रह चुके हैं और वे अपने इन दो पड़ोसियों से रिश्तों से जुड़े व्यावहारिक मुद्दों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। दोनों नेता, भारत और चीन, दोनों से ही अधिकतम सहयोग हासिल करना चाहेंगे।


सामरिक दृष्टि से अहम जगह पर होने के कारण इस छोटे से देश के ऐसा करने में कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि इस देश को अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए। यदि चीन नेपाल के ढांचागत संरचना में निवेश करना चाहे, तो भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


इसे किस तरह देखा जाएगा, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि नेपाल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। इससे भी अहम बात यह है कि चीन चाहे जितना भी निवेश कर ले, वह भूगोल की ज्यादतियों को नहीं बदल सकता। अलबत्ता पाकिस्तानी आतंकी संगठनों द्वारा नेपाली जमीन का दुरुपयोग करने की खबरें भारत के लिए चिंता का कारण हैं।


 भारत को नेपाल के साथ अपने रिश्ते को सुरक्षा की दृष्टि से देखना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि वह कैसे नेपाल के साथ अपने आर्थिक संबंध और साझेदारी को मजबूत कर सकता है। 


-लेखक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वरिष्ठ फेलो हैं। 
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