हिंसा की आग ने शेख मुजीबुर रहमान तक को नहीं बख्शा
हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें आईं और सबसे दुखद बात कि बांग्लादेश के संस्थापक पिता शेख मुजीबुर रहमान तक को नहीं बख्शा गया, जिन्हें बंगबंधु के नाम से भी जाना जाता है। उनकी प्रतिमा को तोड़ दिया गया है और उनके घर को भी जला दिया गया। मुक्ति युद्ध के दौरान उन्होंने जो जॉय बांग्ला का नारा गढ़ा था, उसे तथाकथित न्यायिक प्रक्रिया द्वारा रद्द किया जा रहा है। लग रहा है कि बांग्लादेश के समाज में ऐसे तत्व हैं, जो लोगों के मन से उनकी और मुक्ति युद्ध की यादों को मिटाना चाहते हैं।
बांग्लादेशी लोगों को समझने की जरूरत...
ये लोग जान-बूझकर मूर्तिभंजन का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन बांग्लादेश के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि जो देश महान ऊंचाइयों पर पहुंचने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें अपनी स्मृति और इतिहास में प्रतीक चिह्नों की जरूरत होती है। प्रेरणा लेने के लिए कई उदाहरण हैं। महात्मा गांधी की छवि को नष्ट करने के अनेक प्रयासों के बावजूद वे भारतीय लोगों के दिलों में आज भी जीवित हैं। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रवाद का पोषण होता है। तमाम उथल-पुथल के बावजूद अमेरिकी लोगों ने अपने इतिहास से जॉर्ज वाशिंगटन को नहीं हटाया और न ही तुर्किये में कमाल अतातुर्क, रूस में लेनिन और इंग्लैंड में विंस्टन चर्चिल को भुलाया गया।
एक नजर मुजीबुर रहमान पर
बांग्लादेश के नेता के रूप में मुजीबुर रहमान ने अप्रैल 1971 से अगस्त 1975 में अपनी हत्या तक लगातार बांग्लादेश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रूप में पद संभाला था। लेकिन उन्होंने ब्रिटिश राज और पाकिस्तानी शासन के दौरान 13 साल जेल में भी काटे। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की। बंगाली राष्ट्रवादियों ने उन्हें बांग्लादेश की प्रोविजनल सरकार का प्रमुख घोषित किया, जबकि वह पश्चिमी पाकिस्तान की एक जेल में बंद थे। बाद के वर्षों में, उन्होंने बांग्लादेश के पुनर्निर्माण, धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाने, पाकिस्तानी शासन के युग के तंत्र, नौकरशाही, सशस्त्र बलों और न्यायपालिका को बदलकर एक स्वतंत्र मुल्क के अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
25 मार्च 1971 की वो रात...
हम यह नहीं भूल सकते कि 25 मार्च, 1971 की रात को पाकिस्तानी सेना ने अपने ही देश के पूर्वी हिस्से (अब बांग्लादेश) के नागरिकों पर लगातार बर्बर हमले शुरू कर दिए थे। अकेले ढाका में ही हजारों लोगों को गोली मार दी गई, कई लोगों को बम से उड़ा दिया गया, तो कई को जिंदा जलाकर मार दिया गया। जुलाई 1971 तक, इस नरसंहार से भागकर पैंसठ लाख शरणार्थी पड़ोसी देश भारत पहुंच चुके थे। उनमें से पचास लाख से ज्यादा पश्चिम बंगाल में शरण लिए हुए थे।
भारत ने किया था पड़ोसी धर्म का पालन...
भारत के लगभग 600 शिविरों में से 400 से ज्यादा शरणार्थी शिविर पश्चिम बंगाल में ही थे। मानवीय क्रूरता के काले इतिहास में पूर्वी पाकिस्तान में हुई हत्याएं शायद बोस्निया से भी ज्यादा खूनी थीं और रवांडा जैसी ही वीभत्स मानी जाती हैं। जाहिर है, एक पड़ोसी देश होने के नाते भारत इस नरसंहार को और अधिक अनदेखा नहीं कर सकता था। विशुद्ध मानवीय कारणों से भारत को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। आर्थिक बोझ के चंगुल से खुद को बचाना भी भारत के लिए बेहद जरूरी था। भारत सरकार के सामने खड़ी इस भीषण मानवीय आपदा के लिए सैन्य अभियान ही एकमात्र संभव समाधान था।
इतिहास के पन्ने
इतिहास गवाह है कि भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ (बाद में फील्ड मार्शल) के साथ बैठक की थी और उसके बाद सैन्य योजनाकारों ने अपनी योजना तैयार की थी। जब याह्या खान का शासन पूर्वी पाकिस्तान में अपने ही लोगों को कुचल रहा था, तब वह वाशिंगटन और बीजिंग के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा था।
इन बैठकों के दौरान किसिंजर ने चीनी प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई से पाकिस्तान की रक्षा के लिए भारत को धमकाने की खातिर गुप्त रूप से सेना जुटाने के लिए कहा था। और यह भारतीय सैनिकों के पूर्वी पाकिस्तान में सक्रिय रूप से घुसने से बहुत पहले की बात है। यह निक्सन का अमेरिका था, जो मानता था कि भारत सोवियत रूस का रणनीतिक सहयोगी है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भारतीय सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने इसे पहले ही भांप लिया था और अपने कमांडरों को ऐसी स्थिति के लिए तैयार कर लिया था।
पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण
पाकिस्तान ने तीन दिसंबर, 1971 को ही पश्चिम भारत में भारतीय सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए और भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध 16 दिसंबर, 1971 तक चला, जब पाकिस्तानी सेना के लगभग 93,000 सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के समक्ष अपने हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार भारत की मदद से एक कठिन मुक्ति संघर्ष के बाद बांग्लादेश अस्तित्व में आया। लेकिन 2001 में ही भारत को पता चला कि इस मुक्ति युद्ध में 3,843 भारतीय रक्षाकर्मी मारे गए और 9,851 घायल हुए। ये स्वतंत्र भारत द्वारा लड़े गए सभी युद्धों में सबसे बड़ी संख्या थी।
बांग्लादेश की वर्तमान राजनीति
कहा जाता है कि सुरंग के अंत में रोशनी है। बांग्लादेश में चल रही मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और अल्पसंख्यकों पर कथित हमलों के बीच मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार ने पुष्टि की है कि मुक्ति वाहिनी के दिग्गज 16 दिसंबर, 2024 को भारत के विजय दिवस समारोह में भाग लेंगे। यह कदम बांग्लादेश की मुक्ति में भाग लेने वाले युद्ध के दिग्गजों के दिलों में व्याप्त पीड़ा को काफी हद तक कम करेगा। आज बांग्लादेश को विकास की पटरी पर वापस लाने की जरूरत है और उसे गहरी धार्मिक कट्टरता से बचाने की जरूरत है -लेखक को मुक्ति युद्ध में भागीदारी के लिए वीरता पुरस्कार मिला है।