उल्लेखनीय है कि 1988 की राष्ट्रीय वन नीति कहती है कि पारिस्थितिकीय संतुलन व स्थिरता के लिए जरूरी है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का कम से कम 33 फीसदी भाग वन क्षेत्र होना चाहिए। रिपोर्ट का यह बताना उत्साह बढ़ाने वाला है कि देश के 19 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में वन नीति में निर्धारित प्रतिशत से ज्यादा हिस्से में वन क्षेत्र हैं। दरअसल, वन क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज से तो महत्वपूर्ण हैं ही, ये वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों के लिए भी जीवन रेखा हैं। खासकर भारत जैसे देश में, जहां ग्रामीण आबादी काफी हद तक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, वहां यह वृद्धि आर्थिक व पारिस्थितिकीय स्थिरता को भी प्रोत्साहित करने वाली है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्यादा वन क्षेत्र कार्बन का ज्यादा अवशोषण कर पर्यावरण को शुद्ध करेगा और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत ने 2030 तक ढाई से तीन अरब टन के अतिरिक्त कार्बन अवशोषण की प्रतिबद्धता भी जताई है।
हालांकि इन सबके बावजूद राज्यवार आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं। छह राज्यों को कवर करने वाले जैव विविधता के हॉट स्पॉट पश्चिमी घाट से पिछले दस वर्षों में करीब 58 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का गायब होना चिंताजनक है। यही नहीं, असम में वन क्षेत्र में 86.66 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। अरुणाचल प्रदेश, असम, गुजरात, तेलंगाना और लद्दाख में भी वन क्षेत्र की यह गिरावट देखी जा सकती है। दरअसल, वन क्षेत्र में हुई वृद्धि वाकई एक उपलब्धि है, लेकिन वनों के भीतरी घनत्व में आ रही कमी भी उतनी ही चिंताजनक है। चूंकि वनों की अवैध कटाई, शहरीकरण और खनन गतिविधियां वन संरक्षण की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं, इसलिए इन पर ध्यान देना होगा। सतत व समावेशी रणनीतियों से सामूहिक सहभागिता को प्रोत्साहन देना भी जरूरी है।