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ऊर्जा संकट और कुछ सुझाव: भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 'कामचलाऊ' मॉडल को अपनाना संभव नहीं

शंकर अय्यर
Updated Wed, 01 Apr 2026 07:21 AM IST

सार

2026 का ऊर्जा संकट कई तरह की बाधाओं के एक साथ आने का नतीजा है। मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘कामचलाऊ’ मॉडल को अपनाना संभव नहीं है। इस संदर्भ में कई ऐसे सुझाव हैं, जो वर्तमान संकट से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं।
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भारत ऊर्जा संकट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


भारत इस ऊर्जा संकट में अचानक नहीं फंसा है, बल्कि वह इसमें खुद चलकर आया है-बेपरवाही से, बिना किसी जल्दबाजी के। ट्रंप के युद्ध ने तो बस भारत के तमाम छूटे हुए अवसरों को खोलकर रख दिया है। उसके विरोधाभासों की खाई को और भी गहरा कर दिया है। अर्थव्यवस्था को जो कीमत चुकानी पड़ रही है, वह जान-बूझकर की गई अनदेखी का ही नतीजा है। अब, जब लोग एक बार फिर लंबी-लंबी कतारों में खड़े हैं, तो यहां कुछ सुझाव देना प्रासंगिक लगता है।


भारत अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए आयात पर निर्भर रहा है। 1973 के तेल संकट ने तेल बिल को लगभग चार गुना बढ़ा दिया था। 1979 के संकट के कारण भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक मदद लेनी पड़ी, और बॉम्बे हाई की खोज से भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया। 2014 में, देश ने अपने कच्चे तेल व पेट्रोलियम उत्पादों की जरूरत का 70 फीसदी से अधिक आयात किया था। भाजपा ने 2014 के घोषणापत्र में ‘आयात बिल कम करने’ के लिए ऊर्जा की खोज बढ़ाने का वादा किया था। पर आज देश की तेल आयात पर निर्भरता 88.5 फीसदी से ज्यादा है। बेशक खपत बढ़ी है, पर अहम बात यह है कि घरेलू उत्पादन घट गया है।  


भारत आयातित तेल के बैरल पर अपनी निर्भरता को घरेलू स्तर पर उत्पादित गीगावाट से बदलकर मजबूती बढ़ा सकता है और उसे ऐसा करना भी चाहिए। वर्ष 2005 में, किरीट पारिख की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें एकीकृत ऊर्जा नीति शामिल थी। आज, देश उन कई सिफारिशों को लागू करने में पीछे है। 63 गीगावाट परमाणु ऊर्जा के लक्ष्य के मुकाबले, आज स्थापित क्षमता 8.8 गीगावाट है, जिसमें पिछले 20 वर्षों में लगभग पांच गीगावाट की बढ़ोतरी हुई है। 2030 का 30 गीगावाट का लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी है। पर, महाराष्ट्र में जैतापुर प्रोजेक्ट पिछले 15 वर्षों से अटका हुआ है। जलविद्युत के क्षेत्र में, अनुशंसित 150 गीगावाट के मुकाबले स्थापित क्षमता 51.2 गीगावाट है। परमाणु और जलविद्युत, दोनों ही क्षेत्रों में विस्तार की राह में खराब नियामक सुधार, मंजूरी मिलने में रुकावटें और ‘मेरे इलाके में नहीं’ वाली राजनीतिक सोच जैसी बाधाएं खड़ी हैं।


ऊर्जा संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण रसोई गैस के लिए लगने वाली लंबी कतारें और उनसे जुड़े घोटाले हैं। पाइपलाइन वाली प्राकृतिक गैस (पीएनजी) के विस्तार की काफी चर्चा है, लेकिन यह अभी सिर्फ 1.8 करोड़ घरों तक पहुंचा है, जबकि एलपीजी कनेक्शन 33.3 करोड़ हैं। सच तो यह है कि पीएनजी भी होर्मुज संकट से अछूती नहीं है। असल में भारत ने विकल्पों को तैयार नहीं किया। रसोई गैस के लिए बायोगैस संयंत्र के उपयोग का विकल्प है, खासकर उन राज्यों में जहां, दो-तीन फसलें होती हैं और पराली को जला दिया जाता है। इसके अलावा, सौर ऊर्जा का भी विकल्प है। इंडियन ऑयल ने ‘सूर्य नूतन’ नाम का एक सौर चूल्हा पेश किया है, जिसे ‘पीएम सूर्य घर’ रूफटॉप प्रोग्राम से जोड़ा जा सकता है और ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत दिया जा सकता है। एलपीजी से सौर ऊर्जा की ओर बदलाव से उपयोगकर्ताओं और सरकार, दोनों का बोझ कम होगा।


भारत के पास एक अनोखा कुदरती फायदा है कि यहां साल में 300 दिन धूप खिली रहती है। 2020 में, रिजर्व बैंक ने अपने खेतों पर सौर संयंत्र लगाने के इच्छुक किसानों, स्वयं-सहायता समूहों या किसान उत्पादक संगठनों के लिए ऋण देने की सुविधा शुरू की। सोलर फार्म पैदावार और आय बढ़ा सकते हैं। इसके बावजूद, यह योजना 10,000 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 839 मेगावाट की स्थापित क्षमता तक ही पहुंच पाई है। पीएम कुसुम के तहत मुश्किल से 21.77 लाख किसान हैं, जबकि पीएम किसान के तहत 9.35 करोड़ से ज्यादा किसान हैं। फिर दोनों योजनाओं को आपस में मिला क्यों नहीं दिया जाता?


बड़े लक्ष्य पाने के लिए लीक से हटकर सोचने की जरूरत होती है। भारत की स्थापित क्षमता 524 गीगावाट है, जो 2005 में चीन की 519 गीगावाट क्षमता से अधिक है, जब चीन दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। अकेले 2025 में, चीन ने 543 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ी, जो भारत की कुल उत्पादन क्षमता से भी अधिक है। 2005 के बाद से चीन ने अपनी कुल क्षमता को सात गुना बढ़ाकर 3,900 गीगावाट से भी ज्यादा कर लिया है। अब उसकी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जीवाश्म ईंधन से होने वाली ऊर्जा क्षमता से भी ज्यादा हो गई। चीन ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के रूप में देखता है। उसने अपने डॉलर अधिशेष का उपयोग संसाधन जुटाने के लिए किया, जिसमें एक रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी शामिल है, जिसमें लगभग 1.5 अरब बैरल तेल रखा जा सकता है।
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भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबा समुद्री तट भी है, जहां ज्वारीय, तरंग और महासागरीय ताप ऊर्जाओं का परीक्षण और संचय किया जा सकता है। जैसे-जैसे भारत नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है, उसे बैटरी स्टोरेज की सुविधा बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए और इसे हर राज्य तक पहुंचाना चाहिए। दरअसल, भारत की बैटरी स्टोरेज क्षमता बहुत ही कम है (सिर्फ 5.5 गीगावाट), जबकि मौजूदा जरूरत 61 गीगावाट है। भारत के पास 1.46 लाख किमी से ज्यादा लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग भी हैं, जिनके डिवाइडर वाली जगहों का इस्तेमाल सौर ऊर्जा से ई-चार्जिंग करने और उन खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए किया जा सकता है।


2026 का ऊर्जा संकट कई तरह की बाधाओं के एक साथ आने का नतीजा है। मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘कामचलाऊ’ मॉडल को अपनाना संभव नहीं है।
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