सवाल यह है कि इसके बाद क्या? ध्यान रहे, जिन देशों के पास प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता नहीं है, वे अपने आविष्कारों, अपनी खोजों के दम पर बड़े बनते हैं। हमें भी इसी दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। हमें भी 'बिग आइडियाज' पर काम करना होगा। हमें बड़े सपने देखने होंगे। अपना विजन बड़ा रखना होगा। खुद को बांध कर नहीं रखना है। अपनी महत्वाकांक्षाओं का स्तर हमेशा ऊंचा रखना होगा। तभी हम विकसित देश होने के सपने को पूरा कर सकेंगे। अफसोस की एक बात यह है कि हम कुछ उल्टी दिशा में जाते दिख रहे हैं। एक तरफ विपक्षी दल हैं, जिन्हें केंद्र सरकार के कार्यों में कुछ भी सकारात्मक नहीं दिख रहा है। उन्हें सरकार की सिर्फ बुराई ही करनी है। लेकिन सरकार को भी भविष्य के विजन को लेकर अपना नजरिया स्पष्ट रखना होगा। लोगों को अपने काम की अच्छाइयां बतानी होंगी और अगर कुछ गलत हो रहा हो, तो उसे स्वीकारना भी चाहिए।
अब विवाद में रहे कृषि कानूनों को ही लें। मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को लाने का फैसला किया था। इसमें संदेह नहीं कि ये कानून ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था वाले अपने देश के लिए बेहद जरूरी थे। ये किसानों के भी हित में थे। अगर ये लागू होते, तो देश की अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों पर पहुंच सकती थी। यहां तक कि इसका विरोध करने वाले सभी विपक्षी दलों के घोषणापत्रों में भी इन्हें शामिल किया गया था। लेकिन जब केंद्र सरकार इन्हें लेकर आई, तो विपक्षी दलों ने एक सुर में इनका विरोध करना शुरू कर दिया। इन्हें काला कानून कहा गया। एक साल से ज्यादा समय तक इन कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। राजमार्ग जाम किए गए।
इन प्रदर्शनों के चलते अर्थव्यवस्था को लाखों-करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। अनेक लोगों ने अपनी जानें गंवाईं, सो अलग। आखिरकार विपक्षी दलों की जीत हुई। सरकार को इन्हें वापस लेना पड़ा, जो अपने आप में एक देश विरोधी फैसला था, क्योंकि इसकी वजह नहीं बताई गई। अगर मैं अमेरिका में किसान होता, तो शायद इस कदम के लिए सरकार पर मुकदमा दर्ज कर सकता था। मैं सरकार से पूछता कि किसान की जिंदगी को बेहतर बनाने वाले कानूनों को आपने वापस क्यों लिया? उसे ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।
अगर आप किसान को समृद्ध बनाने का वादा करते हैं, लेकिन उसे पूरा नहीं करते हैं, तो मुझे मुकदमा दर्ज करने का पूरा हक मिलना चाहिए। केंद्र सरकार ने कहा कि देश हित में इन्हें वापस लिया गया है। जबकि यह सच नहीं था। ये कानून देश हित में ही लाए गए थे। इनका वापस लिया जाना दरअसल, दुर्भाग्यपूर्ण था। सत्ताधारी दल हो या फिर विपक्षी दल आत्ममंथन समय की मांग है। तभी देश के लिए सही फैसले लिए जा सकेंगे। विपक्षी दलों को भी अपनी नकारात्मकता छोड़नी होगी, तभी भरोसे का एक माहौल तैयार होगा। (बातचीत पर आधारित)