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भारत-चीन सीमा समझौता: अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी! विशेषज्ञों ने सरकार को सावधानी बरतने की दी सलाह

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 27 Oct 2024 06:07 AM IST

सार

भारत-चीन सीमा समझौता: भारत और चीन के रिश्ते में अविश्वास बना हुआ है। दोनों देशों के बीच सीमा पर कई जगहों को लेकर विवाद है। क्या दोनों देशों के बीच की आम सहमति भारत और चीन को व्यापक बातचीत वाले समाधान की ओर ले जाएगी?
 
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भारत-चीन सीमा समझौता - फोटो : अमर उजाला

चीन धैर्यवान है। वह इंतजार कर रहा है। वह यह दावा नहीं कर रहा कि वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और न ही उसने सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए कोई तारीख तय की है।


एक उभरती हुई शक्ति में इस तरह के गुण बहुत दुर्लभ होते हैं। दूसरी ओर, चीन एक लोकतंत्र नहीं है और वहां रहने वाले लोगों को उस तरह की स्वतंत्रता नहीं है, जिस तरह की लोकतांत्रिक देशों में होती है। इससे अलग भारत लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ अपना 'बखान' करने वाला देश है। भारत समय से पहले जश्न मनाता है।


उदाहरण के लिए देखें, पेरिस ओलंपिक 2024 में पदक तालिका इस प्रकार है-
देश स्वर्ण रजत कांस्य
अमेरिका 40 44 42
चीन 39 27 24
भारत 0 1 5

लेकिन फिर भी अमेरिका या चीन की तुलना में भारत में अधिक उत्सव मनाए गए।


विरोधाभासी घोषणाएं

भारत और चीन के बीच विरोधाभास तब देखने को मिला, जब कुछ ही दिनों पहले दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर 'गश्त व्यवस्था' पर समझौते की घोषणा की गई। मई 2020 में हुई झड़पों के बाद यह पहली सफलता है। इस मामले में भारत की ओर से विदेश सचिव ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि विदेश मंत्री इंटरव्यू दे चुके हैं  और सेना प्रमुख ने भी एक कार्यक्रम में इस पर बात की है।


विदेश मंत्री ने कहा हम 2020 की स्थिति में वापस पहुंच गए हैं।'' हालांकि सेना प्रमुख ने यह भी कहा, "हम अप्रैल 2020 की यथास्थिति पर वापस जाना चाहते हैं। इसके बाद ही हम वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी, तनाव कम करने और सामान्य प्रबंधन पर ध्यान देंगे।


वहीं चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तथ्यपरक बयान देते हुए कहा चीन और भारत राजनयिक और सेना के माध्यम से सीमा से संबंधित मुद्दों पर एक-दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। वर्तमान में दोनों पक्ष जरूरी मामलों में एक समाधान पर पहुंच गए हैं, जिसका चीन ने सकारात्मक मूल्यांकन किया है। अगले चरण में चीन इन समाधान को लागू करने के लिए भारत के साथ काम करेगा। हालांकि चीन ने इसकी विस्तृत जानकारी देने से मना कर दिया।
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हम कहां खड़े हैं?

चीनी सेना (पीएलए) ने मार्च-अप्रैल 2020 में एलएसी को पार कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया। भारत को इस घुसपैठ के बारे में 5 मई, 2020 को पता चला। चीन के घुसपैठियों को खदेड़ने के प्रयास में भारत के 20 जवान शहीद हो गए। हालांकि इसमें चीन को भी अज्ञात संख्या में हताहतों का सामना करना पड़ा।


मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने 19 जून, 2020 को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई। बैठक की समाप्ति पर पीएम ने अपनी टिप्पणी में कहा, "किसी भी बाहरी व्यक्ति ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की है, न ही कोई बाहरी व्यक्ति भारत के अंदर था।" लेकिन कई सैन्य अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 1000 वर्ग किमी का क्षेत्र अब भारत के नियंत्रण में नहीं है। वह क्षेत्र जहां पहले हमारे सैनिक गश्त कर सकते थे।


चीन के साथ अविश्वास 

मुश्किल तथ्य यह है कि चीन पूरी गलवान घाटी को ही अपना मानता है। उसका दावा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 4 से गुजरती है, न कि फिंगर 8 से। उसने हॉट स्प्रिंग के मामले में कुछ नहीं कहा है। भारत डेमचोक और देपसांग पर चर्चा करना चाहता था, लेकिन चीन ने इनकार कर दिया।


चीन अक्साई चीन में भारत के साथ लगने वाली सीमा पर 3488 किलोमीटर के दायरे में सैन्य ढांचा तैयार कर रहा है। उसने एलएसी पर 5जी नेटवर्क स्थापित कर दिया है। उसने पैंगोंग के करीब एक पुल भी बनाया है। चीन ने सैन्य साजो-सामान और हजारों सैनिकों को सीमा पर जमा कर दिया है, जबकि विदेश मंत्रालय आधिकारिक तौर पर घोषणा करती है कि सीमा पर यथास्थिति बहाल रहे।


समाप्ति या शुरुआत

ऐसा लगता है कि गश्त व्यवस्था पर दोनों देशों में अभी पूरी तरह से सहमति नहीं बनी है। ऐसा मालूम पड़ता है कि अब दोनों पक्षों द्वारा एक महीने में दो बार गश्त का समन्वय किया जाएगा और इसमें सैनिकों की संख्या पंद्रह तक सीमित होगी। हालांकि इस व्यवस्था में डेमचोक और देपसांग मैदान   शामिल हैं या नहीं, यह अभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता।


पूर्वी लद्दाख के डेमचोक में 2017 में एक समझौता होने के बाद भी चीन ने इस क्षेत्र पर फिर से कब्जा कर लिया और अपनी उपस्थिति को बड़े पैमाने पर मजबूत कर लिया है। देपसांग के मैदानी इलाकों में चीन ने वाई-जंक्शन से आगे और पारंपरिक गश्त बिंदु 10, 11, 11 ए, 12 और 13 तक भारतीय सैनिकों के पहुंचने के रास्ते को रोक दिया है। विवादों वाली जगहों में गलवान, पैंगोंग त्सो के उत्तर और दक्षिण तट और हॉट स्प्रिंग्स शामिल हैं। यह मान लेना विश्वास की पराकाष्ठा होगी कि इन जगहों से जुड़े सभी मुद्दों को सुलझा लिया गया है।


संसद में चर्चा नहीं होना दुखद

हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़ी दुखद बात यह है कि पिछले चार वर्षों में भारत-चीन के बीच हुई झड़पों पर एक बार भी संसद में चर्चा नहीं होने दी गई। पेट्रोलिंग डील पर रक्षा विशेषज्ञों ने सरकार को सावधानी बरतने की सलाह दी है, वहीं कांग्रेस ने प्रासंगिक और स्पष्ट प्रश्न उठाए हैं और अन्य विपक्षी दल इस मामले पर चुप हैं। क्या अक्तूबर की आम सहमति भारत और चीन को व्यापक बातचीत     वाले समाधान की ओर ले जाएगी? यह बताना जल्दबाजी होगी।
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