गलवां घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच 1975 के बाद हुई सबसे भीषण झड़प में दोनों तरफ के कई सैनिक हताहत हुए हैं। इस घटना की विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है, हालांकि इस साल पूरे क्षेत्र में सिक्किम से लद्दाख तक कई मोर्चों पर उच्च स्तर की हिंसा देखी गई है, जो सामान्य घटना नहीं है।
भारतीय बलों ने यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू और उन्नीस अन्य जवानों को खो दिया है, जबकि चार गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, चीनियों ने अपने वास्तविक हताहतों की संख्या नहीं बताई है, लेकिन अनुमान 35 से लेकर 43 मृतकों तक है।
मई के प्रारंभ में भारतीय क्षेत्र में चीन द्वारा जबरन प्रवेश करके यथास्थिति बदलने की कोशिश के बाद से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अशांति है। चीन ने उन क्षेत्रों में डेरा जमा लिया, जिस पर वह दावा करता है, लेकिन भारतीय बल उन्हें विवादित मानते हैं। चीनी बलों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए भारतीय बलों ने भी जवानों को तैनात किया था।
दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर के कई दौर की बातचीत हुई, जिसमें लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की उच्च स्तरीय वार्ता भी शामिल है। साथ ही राजनयिक संवाद भी हुए हैं, लेकिन गतिरोध का कोई समाधान नजर नहीं आता है। ऐसी घटना भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व, दोनों के लिए आंख खोलने वाली है।
इसलिए निम्न पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है- पहला, जो अब स्पष्ट है, वह यह है कि समझौतों के पालन के लिए चीनियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, भले ही इन्हें उनके सैन्य या राजनीतिक नेतृत्व ने ही अनुमोदित क्यों न किया हो। सीमा विवादों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच पांच राजनीतिक समझौते हुए हैं, जिनमें से किसी का भी चीन ने पालन नहीं किया ।
दूसरा, दोनों बल झड़प को रोकने के लिए बिना हथियार के चलते हैं। भारतीय सैन्य दल भी बिना बल प्रयोग के गतिरोध हल करना चाहते हैं। मगर अब चीन की उत्तेजक कार्रवाई और हिंसा की बढ़ती प्रकृति परिदृश्य को बदल देगी। तार्किक रूप से अब ऐसे आदेश जारी किए जाने चाहिए कि भारतीय सैनिक हथियारों के साथ आगे बढ़ें और चीन द्वारा फिर से हिंसा करने पर गोली से जवाब दें।
तीसरा, वार्ता की धीमी प्रगति इसका प्रमाण है कि चीनी गतिरोध को समाप्त करने की जल्दी में नहीं हैं। इसलिए, भारत को भी उसी तरह का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और आगे कई स्तरों पर बातचीत की मांग नहीं करनी चाहिए।
चौथा, भारत को रक्षात्मक के बजाय आक्रामक होने की आवश्यकता है। उसे अपने जवानों को उन क्षेत्रों में तैनात करना चाहिए, जिसे वह अपना मानता है। इससे झड़प बढ़ सकती है, पर जब तक चीन को उसी की भाषा में जवाब नहीं दिया जाएगा, वह दबाव में नहीं आएगा।
पांचवां, कोई भी पक्ष झड़प नहीं चाहता है। चूंकि चीन ने गतिरोध खत्म करने और वापस जाने की बात मान ली थी, इसलिए स्पष्ट है कि उसका उद्देश्य क्षेत्र पर कब्जा करना नहीं था। हो सकता है, चीन दबाव बनाकर राजनयिक या आर्थिक रियायत चाहता हो।
भारत ने स्पष्ट घोषणा की है कि वह न झुकेगा और न ही दबाव में आएगा, खासकर जब सीमा और बुनियादी ढांचे के विकास की बात हो। ऐसे में, सैन्य और मध्य राजनयिक स्तरों पर वार्ता जारी नहीं रह सकती। यदि दोनों राष्ट्र झड़प के बजाय समाधान की इच्छा रखते हैं, तो वार्ता में राजनीतिक नेतृत्व को शामिल होना चाहिए।
अंत में, अगर चीन हिंसक कार्रवाई को जारी रखता है, तो भारत को कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत में चीनी आक्रामकता को संभालने की क्षमता है। इसे वैश्विक समर्थन भी हासिल है, क्योंकि चीनी कार्रवाई से चीन पर और दबाव बढ़ेगा।
चीन के लिए जोखिम बढ़ाना खतरनाक है। यदि उसे पीछे धकेल दिया जाता है, जो होगा, या हिंसक जवाब दिया जाएगा, तो चीनी सेना की अजेयता अनंत काल के लिए खत्म हो जाएगी। इससे चीन के उन पड़ोसियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा, जिनके साथ अभी उसके विवाद हैं। किसी भी तरह के सैन्य टकराव की स्थिति में भारत-चीन संबंध एक दशक पीछे चला जाएगा।
अगर हिंसा पर अंकुश लगाना है, तो जब तक गतिरोध खत्म करने के लिए बातचीत जारी रहेगी, तब तक दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सेना पीछे हटे और उनके बीच एक दूरी बनी रहे। इस दौरान भारत को झड़प के लिए तैयार रहने की जरूरत है। (लेखक सेवानिवृत्त मेजर जनरल हैं।)