भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह की वर्चुअल रैली के जरिये आगामी नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है, जिसमें गृह मंत्री पार्टी संयोजक के पुराने अवतार में दिखाई दिए। इस रैली ने इन अटकलों पर विराम लगा दिया कि महामारी को देखते हुए चुनाव स्थगित हो जाएंगे, जो आने वाले हफ्तों में बिहार को बुरी तरह से प्रभावित करने वाला है।
अपने परिवार के साथ सैकड़ों मील पैदल चलकर बिहार लौटे करीब 25 लाख प्रवासियों का आगामी चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, इसका मूल्यांकन किया जाना बाकी है। हालांकि एक बात निश्चित है। इससे राज्य में बेरोजगारी बढ़ेगी और ये प्रवासी मजदूर अपने घर जो पैसे भेजते थे, उसमें भारी कमी आएगी, इससे खास तौर पर राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संकट बढ़ेगा।
ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव सामान्य तरीके से ही होने जा रहा है, हालांकि चुनाव आयोग इस विषय पर अब तक चुप है। आगामी अक्तूबर-नवंबर में पारंपरिक तरीके से मतदान कराने के लिए बड़ी संख्या में बूथ बनाने होंगे, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग को सुनिश्चित किया जा सके।
तमाम संभावनाओं में इस बार बिहार के चुनाव में मतदान में गिरावट देखी जा सकती है। स्पष्ट तौर पर भाजपा ने इस बात का हिसाब लगाया है कि जो पार्टी अपने समर्थकों को वोट डालने के लिए लामबंद कर पाएगी, उसे फायदा होगा।
कई राज्यों में 'पन्ना प्रमुख' बनाने की अपनी रणनीति की तरह, भाजपा अब बिहार के हर विधानसभा क्षेत्र में 'प्रभावशाली' लोगों की पहचान कर रही है, जो मतदाताओं को प्रभावित करेंगे। वह पहले ही 1,000 मंडलों में ‘मंडल पुस्तिका’ वितरित कर चुकी है और संभावित प्रभावशाली लोगों के बारे में जानकारी मांगी है।
भाजपा नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए सरकार से मतदाताओं की नाराजगी दूर करने या किसी भी तरह की कमियों की भरपाई करने के लिए अपने सांगठनिक ढांचे पर भी निर्भर है। हालांकि यहां एक सवाल उठना लाजिमी है, जिसका उत्तर अभी नहीं मिला है कि क्या भाजपा नीतीश कुमार के साथ गठबंधन को जारी रखेगी?
या उनसे दूरी बनाकर कोविड-19 से निपटने में हुई गड़बड़ियों का सारा दोष सरकार पर डाल देगी? अमित शाह ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि नीतीश कुमार बिहार के आसन्न चुनावों में राजग का नेतृत्व करेंगे। लेकिन भाजपा में ऐसी आवाजें लगातार बढ़ रही हैं, जो अकेले चुनाव लड़ने की बात कर रही हैं।
वे कहते हैं कि बिहार के ‘सुशासन बाबू’ महामारी से पहले से ही अपना जनाधार खो चुके हैं और आज बिहार में स्वास्थ्य व भूख के संकट के तेजी से बढ़ने के साथ उनकी छवि को और नुकसान पहुंचा है। शुरू में उन्होंने प्रवासी मजदूरों के बिहार लौटने का विरोध किया था, जो अपने घर जाने के इच्छुक फंसे हुए लोगों को अच्छा नहीं लगा।
हालांकि नीतीश कुमार ने अपने अधिकारियों को ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम आधारित रोजगार उत्पन्न करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन करने की तुलना में कहना आसान है। भाजपा में नीतीश विरोधी गुट का तर्क है कि राजद-कांग्रेस की स्थिति अब वैसी नहीं है, जो 2015 में थी, जब उसने जदयू गठजोड़ करके जीत हासिल की थी और भाजपा को पराजित किया था।
लालू यादव के उत्तराधिकारी के रूप में शुरू में तेजस्वी यादव ने अपनी अच्छी छवि बनाई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना प्रभाव खो दिया और उसकी पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई। तेजस्वी ने प्रवासी बिहारियों की सुध ली और एनजीओ और अन्य लोगों को जुटाकर प्रवासियों को कुछ राहत प्रदान की।
लेकिन अन्य विपक्षी नेताओं की तरह वह भी ट्वीटर और अन्य सोशल मीडिया के जरिये अपनी राजनीति चलाते हैं। सोशल मीडिया महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। लालू यादव अभी जेल में हैं और उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसलिए तेजस्वी चुनाव जीतने के लिए लालू यादव से रोजमर्रा का मार्गदर्शन नहीं ले सकते हैं।
नीतीश विरोधी यह भी तर्क देते हैं कि लोगों में अपनी छवि खराब किए बिना नीतीश कुमार के लिए राजद के साथ फिर से गठबंधन करना मुश्किल होगा। ऐसे में, भाजपा त्रिकोणीय मुकाबले में बढ़त हासिल कर सकती है। जीतन मांझी के एचएएम तथा आरएलएसपी जैसे छोटे दल उसके पाले में लौट सकते हैं।
इस बात को लेकर अनिश्चितता है कि गैर-यादव ओबीसी, जिनमें अति पिछड़ी जातियां भी शामिल हैं, किधर जाएंगे, इस कारण भाजपा सतर्कता से आगे बढ़ रही है। 2019 में नीतीश कुमार ने अपने पत्ते शानदार ढंग से खेले थे।
उन्होंने भाजपा से कई सीटों के लिए सफलतापूर्वक सौदेबाजी की, जबकि अकेले चुनाव लड़ने पर 2014 के लोकसभा चुनावों में वह केवल दो सीटें जीतने में कामयाब रहे थे। किस्मत ने भी उनका साथ दिया। गुजरात और कर्नाटक में झटका खाने के चलते भाजपा नीतीश के साथ गठबंधन तोड़ना नहीं चाहती थी। ऊपर से कांग्रेस के कुछ लोग धर्मनिरपेक्ष महागठबंधन में नीतीश के लौटने का शोर मचा रहे थे।
तो क्या इस बार भाग्य नीतीश कुमार के साथ नहीं है? कुछ भी हो, अमित शाह की आभासी रैली ने गठबंधन में निहित तनावों को रेखांकित किया। भाजपा ने इसे पार्टी कार्यक्रम बनाया, जबकि इसे एनडीए का कार्यक्रम होना चाहिए था। शाह ने नीतीश का केवल एक बार जिक्र किया था।
यह अमित शाह की जुलाई, 2018 में हुई पटना रैली के ठीक विपरीत था, जब उन्होंने दोनों दलों के बीच के मतभेदों को दूर करने के लिए दावा किया था कि नीतीश कुमार ‘मजबूती से’ एनडीए के साथ हैं। क्या भाजपा नीतीश के बिना चुनाव में जाने का जोखिम उठाएगी?
आखिरकार, स्थिति गतिशील है और विकसित हो रही है। बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने या बीमारी या भूख से मरने का राजनीतिक नतीजा क्या होगा, यह आने वाले हफ्तों में पता चलेगा? या फिर चुनाव में बड़ी संख्या में सीटें जीतकर भाजपा धीरे-धीरे नीतीश से दूरी बनाने का विकल्प चुनेगी, ताकि नीतीश कुमार को जूनियर पार्टनर बनाया जा सके।
और गठबंधन के विजयी होने पर मुख्यमंत्री पद के लिए बोली लगाया जाएगा? एक बात तो स्पष्ट है कि भाजपा एक बार फिर से बढ़ते स्वास्थ्य संकट से राजनीति की ओर ध्यान दे रही है। गुजरात की तरह राजस्थान में भी कांग्रेस ने अतिरिक्त राज्यसभा सीट जीतने के लिए भाजपा पर कांग्रेस विधायकों को बरगलाने का आरोप लगाया है। जाहिर है, भाजपा ने पूरे भारत में शासन करने की अपनी योजना को त्यागा नहीं है।