शनिवार को कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच जो शांति समझौता हुआ है, यह न केवल अमेरिका की हार है, बल्कि भारत के लिए भी खतरे की घंटी है। इस समझौते के बाद भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं। दरअसल अफगानिस्तान से निकलने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बेताब थे, क्योंकि उन्होंने अपने पिछले चुनाव प्रचार में अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी फौज की वापसी का वादा किया था। इसमें वह अब तक सफल नहीं हो पाए हैं और इसी साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। चुनाव में ट्रंप के लिए अमेरिकियों को यह समझा पाना बहुत कठिन होता कि वह अपनी फौज को वापस क्यों नहीं बुला पाए। इसलिए उन्होंने तालिबान के सामने लगभग घुटने टेकते हुए यह शांति समझौता किया है। इस समझौते में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की समय सीमा तय की गई है। अमेरिका भले इसे स्वीकार न करे, लेकिन सच यही है कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपना नियंत्रण नहीं जता पाया है।
अफगानिस्तान में अमेरिका की लगभग वैसी ही दुर्गति हुई, जैसी वियतनाम में हुई थी। वियतनाम में काफी कुछ दांव पर लगाने के बावजूद जब मामला उससे संभल नहीं पाया, तब अंत में उसे पीछे हटना पड़ा। उसी तरह से अफगानिस्तान में उसे खरबों डॉलर खर्च करने और हजारों सैनिकों को गंवाने के वावजूद सफलता नहीं मिली। तालिबान ने पाकिस्तान की मदद से उसे वहां पर मुंहतोड़ जवाब दिया, जिसके कारण अंततः अपनी इज्जत बचाने के लिए उसे यह शांति समझौता करना पड़ा। हालांकि अमेरिकी सैनिकों की वापसी रातोंरात नहीं होगी, 14 महीने की सीमा तय की गई है। यह शर्त रखी गई है कि अगर इस बीच तालिबान ने शर्तों का उल्लंघन किया, तो अमेरिका फिर वापस अफगानिस्तान लौटेगा। पर ऐसा हो पाएगा, इसमें संदेह है।
जहां तक भारत की बात है, तो इससे पहले हम तालिबान के साथ कोई बात नहीं करना चाहते थे, लेकिन इस समझौते के वक्त भारत के प्रतिनिधि भी दोहा में मौजूद थे। असल बात यह है कि ट्रंप ने इसमें भारत को भी शामिल कर लिया है। भारत ने अफगानिस्तान में विभिन्न बुनियादी संरचनाओं के निर्माण में दो अरब डॉलर से अधिक निवेश किया है। अफगानिस्तान में अपने दूतावास वगैरह की सुरक्षा के लिए हमने अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां भी तैनात की हैं। लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान पाकिस्तान के लिए वही काम कर रहा है, जो काम लश्कर-ए तैयबा और जैश-ए मोहम्मद हमारे देश में करता है। पिछले दिनों ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के साथ हम सकारात्मक काम कर रहे हैं और आतंकवाद के खिलाफ हम मिलकर लड़ेंगे। लेकिन सच तो यह है कि पाकिस्तान ही आतंकवाद का गढ़ है, जिसकी मदद से ट्रंप प्रशासन ने तालिबान के साथ यह समझौता किया है।
अगर अफगानिस्तान में तालिबान का शासन हो जाएगा, तो भारत के लिए वहां पाकिस्तान कई मुश्किलें खड़ी कर सकता है और अफगानिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकता है।
अब एक आशंका यह भी है कि अमेरिका भारत पर दबाव डालेगा कि वह अपने सैनिकों को अफगानिस्तान में तैनात करे, क्योंकि अमेरिकी फौज वहां से हट जाएगी। यानी अमेरिका अपना बोझ भारत के कंधों पर डालना चाहेगा। लेकिन इसमें दो-तीन मुश्किलें हैं। पहली तो यह कि जैसे ही अफगानिस्तान में हमारी भूमिका बढ़ेगी, तो पाकिस्तान उसमें बाधाएं उत्पन्न करेगा, क्योंकि वह अफगानिस्तान को अपने कब्जे में रखना चाहता है। 1990 के दशक से ही उसकी रणनीतिक सोच है कि अगर भारत ने उस पर कभी बड़ा हमला किया, तो वह अफगानिस्तान में तालिबान के साथ मिलकर भारत पर जवाबी हमला करेगा।
दूसरी बात यह है कि हम अपने सैनिक अफगानिस्तान में क्यों भेजें और उसका खर्चा कौन उठाएगा? क्या हमारे पास इतने सैनिक हैं कि हम वहां अमेरिका का बोझ उठा पाएं? हमारे पास यदि उतने सैनिक हैं भी, तो हमें उन्हें अपनी घरेलू समस्या सुलझाने के लिए तैनात करना चाहिए, जैसे कि कश्मीर या नक्सल समस्या से निपटने के लिए। अफगानिस्तान तो हमारे सैनिकों का खर्चा उठा नहीं पाएगा, तो क्या अमेरिका उठाएगा? अगर नहीं, तो क्यों हम अपनी सेना को वहां भेजें! सोचने वाली बात यह भी है कि अगर अमेरिकी सैनिक वहां इतने वर्ष फंसे रहे, तो क्या हम अपने सैनिकों को भी वहां फंसाना चाहेंगे! ऐतिहासिक रूप से अफगानिस्तान एक ऐसा दलदल है, जहां बड़ी-बड़ी सैन्य शक्तियां फंसी रही हैं, रूस और अमेरिका के साथ यही हुआ। फिर अगर हम अपनी सेना वहां नहीं भेजेंगे, तो वहां हमारी भूमिका क्या होगी? पहले से ही अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों पर रूस और चीन की नजरें लगी हुई हैं। तो क्या हम खनिज संसाधनों के लिए रूस और चीन से संघर्ष करेंगे या उससे प्रतिस्पर्धा करेंगे? वहां हमारा लक्ष्य क्या है, यह अब तक हमारी सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है।
अमेरिका ने दस साल पहले भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलवाने का भरोसा दिलाया था, जो अब तक हुआ नहीं। इसलिए अमेरिका की बातों पर भरोसा करना नासमझी ही होगी। भारत को खुद सोचना होगा कि अब उसके राष्ट्रीय हित में क्या है।
बेशक अफगानिस्तान के साथ हमारे ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं, लेकिन हमारी विवशता है कि अफगानिस्तान के साथ हमारी स्थलीय सीमा नहीं जुड़ी है। अगर हम हवाई मार्ग से अफगानिस्तान में रसद पहुंचाना चाहें, तो मध्य एशिया के जरिये थोड़ी बहुत रसद पहुंचा सकते हैं। लेकिन अमेरिका ने तो अफगानिस्तान के चारों तरफ हमारे लिए रास्ते बंद कर दिए हैं। पाकिस्तान अपने एयर स्पेस का इस्तेमाल नहीं करने देगा, अमेरिका कहता है कि ईरान के साथ रिश्ते तोड़ दो, ऐसे में अगर हम वहां कुछ करना भी चाहें, तो कहां से कर पाएंगे! अमेरिका ही वहां हमें आगे बढ़कर भूमिका निभाने के लिए कहता है और वही हमारे रास्ते भी रोक रहा है। ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन पर हमारी सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा। हमें सतर्कता पूर्वक देखना होगा कि अमेरिका के बताए रास्ते पर चलने से हमें क्या मिलने वाला है!