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साठा पर प्रतिबंध का मतलब

रमेश ठाकुर Published by: Raman Singh Updated Mon, 02 Mar 2020 06:33 PM IST
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रमेश ठाकुर - फोटो : a

धरती की कोख सूखा देने वाले साठा या चैनी धान की फसल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने आखिरकार प्रतिबंध लगा ही दिया। यह मांग लंबे समय से हो रही थी। इस फसल द्वारा भू-जल स्तर को नुकसान पहुंचाए जाने के बारे में सूबे की सरकार ने वैज्ञानिकों से राय मांगी थी। उसके बाद कई टीमें गठित की गईं और उन्हें नमूना लेने के लिए उन जिलों में भेजा गया, जहां साठा धान सबसे ज्यादा उगाया जाता रहा है। नेपाल से सटे तराई के पूरे इलाके में किसान साठा धान उगाते रहे हैं। वहां से नमूने लेने के बाद सरकार ने कृषि प्रयोगशालाओं में जांच कराई, जिसमें पता चला कि यह फसल जमीन की नमी को सबसे ज्यादा सोखती है। रिपोर्ट पर तत्काल प्रभाव से फैसला लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने साठा धान की फसल पर प्रतिबंध लगा दिया।



पर्यावरण की रक्षा को ध्यान में रखकर उठाए गए सरकार के निर्णय पर पर्यावरणविदों ने अनुकूल प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि वे कई वर्षों से इस फसल पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे। कई राज्यों में साठा धान पर पहले से ही प्रतिबंध है। पीलीभीत, गोंडा, बहराइच, लखीमपुर जैसे उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्रों में साठा धान मार्च से जून के बीच बहुतायत में उगाया जाता रहा है। इस फसल ने धीरे-धीरे तराई क्षेत्र को सूखे की तरफ धकेल दिया था। पिछले वर्ष आई एक वैज्ञानिक रिपोर्ट से पता चला था कि नमी वाले इस इलाके का भू-जल स्तर काफी नीचे खिसक गया है, जिसका कारण साठा धान उगाना ही बताया गया। दरअसल गीला और नमीयुक्त इलाका होने के कारण तराई को चावल का कटोरा भी कहा जाता है। पर मानवीय हिमाकतों ने धान की पैदावार की चाह में प्रकृति के साथ खुलेआम खिलवाड़ किया।


नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र का भू-जल स्तर पूरे देश से ज्यादा है, जहां मात्र पंद्रह फीट नीचे पानी निकल आता है। पर इस पानी का दोहन लगातार जारी था और फसल माफिया इसका लाभ उठा रहे थे। तराई का क्षेत्रफल हजारों हेक्टेयर में फैला है। इसका काफी हिस्सा उतराखंड में आता है। वहां अब भी साठा धान रोपने का सिलसिला जारी है। लेकिन उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश की तरह वहां भी देर-सबेर साठा पर प्रतिबंध लगाया जाएगा, क्योंकि पंजाब-हरियाणा में साठा धान की खेती पर वर्षों पहले से रोक लगी है। उत्तराखंड में ऐसा कदम उठाना जरूरी है, क्योंकि गर्मियों में यह राज्य पानी को तरसता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, तराई में भू-जल स्तर तो नीचे चला ही गया है, साठा धान की फसल के चलते वहां की मिट्टी और पानी का संतुलन भी बिगड़ गया है। उतराखंड के ऊधमसिंहनगर, जसपुर और काशीपुर में पिछले एक दशक में भू-जल स्तर दो से चार मीटर तक नीचे खिसका है।


गनीमत इस बात की है कि उत्तर प्रदेश सरकार समय रहते चेत गई। अगर वह साठा पर रोक नहीं लगाती, तो गर्मी में धान की फसल के लिए पानी का अंधाधुंध दोहन इस पूरे क्षेत्र को एक दिन बेपानी कर देता। सरकार ने साठा पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ सभी जिलाधिकारियों को जमीनी स्तर पर गहरी नजर रखने के निर्देश दिए हैं। इसी सीजन में साठा धान रोपा जाता है। इस बार भी किसानों ने तैयारी की थी, लेकिन प्रतिबंध के फरमान के बाद उनके अरमानों पर पानी फिर गया है। सूबे की सरकार ने तो अपना काम कर दिया, अब दारोमदार स्थानीय प्रशासन पर है कि वह जमीनी स्तर पर इस फैसले का उल्लंघन न होने दे।

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