अपनी आजादी की स्वर्ण जयंती तथा बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की जन्म शताब्दी के समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाकर मुजीबर रहमान की बेटी तथा प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कई मोर्चे पर अर्थपूर्ण संदेश दिए। एक महत्वपूर्ण संदेश यह था कि तेजी से विकसित हो रहे बांग्लादेश के लिए भारत का महत्व सर्वाधिक है और बांग्लादेश की स्वतंत्रता में भारत का निर्णायक योगदान रहा है, भले ही वहां के कट्टरवादी भारत-विरोधी राग अलाप रहे हों। शेख हसीना के इस फैसले से इसका भी पता चलता है कि वर्ष 2026 तक बांग्लादेश ने अल्प विकसित देशों की सूची से खुद को बाहर निकालने का जो लक्ष्य रखा है, उसे हासिल करने के लिए भारत के साथ व्यापार एवं पारगमन साझेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि 26 मार्च, 1971 को बांग्लादेश ने स्वतंत्रता का आह्वान किया था, जबकि आजादी उसे 16 दिसंबर, 1971 को युद्ध में पाक सैनिकों के आत्मसमर्पण के बाद मिली थी।
दूसरी ओर, महामारी की पृष्ठभूमि में पहले विदेश दौरे के रूप में बांग्लादेश को चुनकर नरेंद्र मोदी ने भी संदेश दिया कि बांग्लादेश के साथ रिश्ते में भारत पूरी संजीदगी बरतेगा। बांग्लादेश से पाकिस्तान यह सबक जरूर सीख सकता है कि अतीत के बजाय वह भविष्य पर निगाह रखे। वर्ष 1971 में बांग्लादेश का जन्म पाकिस्तान के लिए बेहद तकलीफदेह अनुभव था। पाक सैन्य तानाशाह लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान के निर्देश पर पाक सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान (अब स्वतंत्र बांग्लादेश) में आजादी के लिए उठती आवाजों को निर्ममता से कुचलना शुरू किया और मार्च, 1971 के बाद वहां बड़े पैमाने पर नरसंहार को अंजाम दिया था।
बंगालियों और पश्चिमी पाकिस्तानियों के बीच विवाद की शुरुआत शेख मुजीबुर रहमान द्वारा 1966 में पेश किए गए छह सूत्री फॉर्मूले से हुई, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान की स्वायत्तता की मांग थी। मुजीबुर रहमान को जेल में डाल दिया गया और भारत पर भी मुजीब की मदद करने का आरोप लगाया गया। आईएसआई को बंगालियों के गुस्से के बारे में कुछ पता नहीं था, लिहाजा सैन्य तानाशाह भांप भी नहीं पाए कि बंगालियों का विद्रोह पाकिस्तान के कुशासन का ही नतीजा है। 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही पूर्व पाकिस्तान के बंगाली अपने आर्थिक शोषण तथा उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बना दिए जाने के कारण क्षुब्ध थे। वहां की चाय और जूट से ही पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा अर्जित होती थी, पर उस पैसे का इस्तेमाल पश्चिमी क्षेत्र को समृद्ध बनाने में किया जाता था। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को बाढ़ और तूफान से सुरक्षा भी नहीं दी जाती थी, जिससे मौत के अलावा भारी आर्थिक नुकसान भी होता था। पूर्वी पाकिस्तानियों की भाषा और संस्कृति भी अलग थी, इसलिए वे स्वायत्तता चाहते थे।
26 मार्च, 1971 का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि 25/26 की मध्यरात्रि के कुछ ही मिनट बाद मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश की आजादी का एलान कर दिया था। इस पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन पर राजद्रोह लगाने तथा फांसी देने का डर दिखाया गया, पर वह डटे रहे। 27 मार्च, 1971 को पाक सेना के एक बंगाली अधिकारी मेजर जियाउर रहमान ने भी, जो बाद में मुजीबुर रहमान के प्रतिद्वंद्वी बने, बांग्लादेश की आजादी की घोषणा कर दी। मई, 1971 में मुक्ति वाहिनी ने पूर्वी पाकिस्तान को 11 हिस्सों में बांटकर पाक सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। पर पाक सेना का अत्याचार जारी रहने से भारी संख्या में पूर्वी पाकिस्तानियों ने भारत का रुख किया। मई के आखिर तक भारत में शरणार्थियों की संख्या करीब एक करोड़ हो चुकी थी, और विश्व बैंक के मुताबिक, भारत पर इसका सालाना आर्थिक बोझ करीब 70 करोड़ डॉलर था, जो तब भारत के रक्षा बजट का लगभग आधा था। इस आर्थिक बोझ के कारण ही भारत ने इसमें दखल दिया। पूर्वी भारत में तब जगह-जगह शरणार्थी शिविर थे, तो कोलकाता में बांग्लादेश की निर्वासित सरकार थी।
ढाका को पाकिस्तान से मुक्त कराने के अभियान के दौरान भारतीय सेना ने पाक बर्बरता के असंख्य सुबूत देखे, जिन्हें लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी के निर्देश पर पाक सैनिकों ने अंजाम दिया था। यही कारण था कि 16 दिसंबर, 1971 को नियाजी ने भारत के सामने शर्त रखी थी कि उनके सैनिक आत्मसमर्पण करने के बाद भी अपने साथ हथियार रखेंगे। नियाजी को भय था कि सैनिकों के निहत्थे होने पर क्षुब्ध बंगाली उनकी जान ले लेंगे। लेफ्टिनेंट जनरल जे एस अरोड़ा ने वह शर्त मान ली, क्योंकि भारत खून-खराबे का अंत चाहता था। अरोड़ा ने इसलिए भी शर्त मानी थी, क्योंकि वह आईएमए, देहरादून में नियाजी के सहपाठी रहे थे। 20 दिसंबर, 1971 को पाक राष्ट्रपति याह्या खान ने इस्तीफा दिया और जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता सौंप दी। पर आठ जनवरी, 1972 को शेख मुजीबुर रहमान जब आजाद होने के बाद रावलपिंडी से लंदन की उड़ान भर रहे थे, ताकि स्वतंत्र बांग्लादेश में जाकर सत्ता संभाल सकें, तब हवाई अड्डे पर भुट्टो ने ही उन्हें विदाई दी। इन पचास साल में भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। पर नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय बांग्लादेश दौरे ने इन दो देशों के संबंधों को दक्षिण एशिया के आदर्श द्विपक्षीय रिश्तों के तौर पर परिभाषित कर दिया है।