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बहुध्रुवीय विश्व में भारत और चीन

Mon, 11 May 2015 07:30 PM IST
तरुण विजय
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय चीन यात्रा (14-16 मई) उनकी सबसे महत्वपूर्ण सामरिक यात्रा मानी जा रही है। यह यात्रा आंकड़ों के गणित और सीमा विवाद के सुलझाव से बढ़कर विश्वास के समीकरण मजबूत करने पर ज्यादा केंद्रित होगी। अविश्वास की गहराती खाई कम हुई, तो फिर कुछ भी संभव है-पूंजी निवेश, व्यापार में असंतुलन और सरहद के विवाद-सब सुलझाए जा सकते हैं। वैसे भी इस समय दिल्ली और बीजिंग में दो इतने मजबूत नेता हैं, जो लीक से हटकर साहसी फैसले करने का दम रखते हैं।
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सबसे बड़ा निकटतम पड़ोसी, लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर की सरहद और दूसरा सबसे ज्यादा व्यापारिक साझेदार होने के बावजूद सबसे ज्यादा विवाद और आशंकाओं का देश चीन ही है। आज के बहुध्रुवीय विश्व में चीन और भारत की मित्रता वैश्विक, सामरिक परिदृश्य पर गहरा असर डाल सकती है, और विशेषकर एशिया में अपनी छाप छोड़ सकती है। इस परिदृश्य में सबसे बड़ा मुद्दा महासागरीय प्रभुता का है। हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर लगातार चीन और अमेरिका के मध्य सैन्य प्रतिस्पर्धा के कारण तनावग्रस्त होते दिख रहे हैं। प्रशांत महासागर क्षेत्र को अमेरिका अपनी प्रभुता के अंतर्गत रखने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है, तो चीन दक्षिण चीन सागर को अपनी निजी संपदा मानकर चलता है, और इस कारण फिलीपींस, वियतनाम, जापान और कोरिया के साथ उसके गहरे शीतयुद्ध जैसे तनाव पैदा हो गए हैं। इस परिदृश्य में हिंद महासागर और प्रशांत महासागर क्षेत्र के देश केवल भारत की उपस्थित को अपने लिए सुरक्षित और आश्वस्तकारी मानते हैं। भारत को इस स्थिति का सामरिक लाभ मिलेगा ही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के साथ बहुत परिपक्व और आत्मविश्वास भरी कूटनीति का परिचय दे रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश और उत्तर सीमा पर तनिक भी समझौता न करते हुए स्टेपल वीजा और चीनी घुसपैठ पर कठोर रुख अपनाते हुए तथा अरुणाचल राज्य स्थापना दिवस पर जाने वाले पहले प्रधानमंत्री होने की दृढ़ता प्रकट करते हुए भी चीन से संवाद और संबंध सुधारने में मोदी अन्य सभी प्रधानमंत्रियों से आगे बढ़ गए हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की गत सितंबर में भारत यात्रा और उसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा ने प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के लिए बहुत अनुकूल वातावरण बना दिया है।
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शी जिनपिंग ने भारत में 20 अरब डॉलर यानी लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये के पूंजी निवेश का वचन दिया था, और चीनी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैसे हुआवे, अलीबाबा और शियोमी चार अरब डॉलर प्रतिवर्ष के चीनी पूंजी निवेश का लक्ष्य आसानी से हासिल कर सकती हैं। वैसे भी भारत-चीन के बीच जो 12 औद्योगिक समझौते हुए, उनमें औद्योगिक पार्क, रेलवे आदि के क्षेत्र में 13 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की संभावना है।

चीन की बेइची फोटोन मोटर कॉरपोरेशन ने पुणे में पांच अरब डॉलर के पूंजी निवेश वाले औद्योगिक पार्क के समझौते पर हस्ताक्षर किए, और ऐसा ही एक चीनी औद्योगिक पार्क 1.8 अरब डॉलर की लागत से वडोदरा में बनाया जा रहा है। पुणे और वडोदरा में चीनी पूंजी निवेश लगभग डेढ़ लाख भारतीयों को रोजगार देगा। आपसी संबंधों में हाल ही में भारत ने एशिया ढांचागत पूंजी निवेश बैंक (एआईआईबी) में शामिल होना स्वीकार किया, लेकिन चीन द्वारा प्रस्तावित सागर क्षेत्रीय रेशम मार्ग (मैरीटाइम सिल्क रूट) पर वह सोची-समझी निरपेक्षता अपनाए हुए है। हालांकि मोदी की चीन यात्रा से पहले चीनी राष्ट्रपति की पाकिस्तान यात्रा हुई, लेकिन भारत ने इसे प्रकटतः अधिक महत्व नहीं दिया। फिलहाल चीन के साथ हमारा 71 अरब डॉलर का व्यापार है, जिसमें प्रायः हम 54.2 अरब डॉलर का सामान चीन से आयात करते हैं। इस असंतुलन को दूर करना भी इस यात्रा का एक उद्देश्य है।

नाथुला से कैलास-मानसरोवर यात्रा के लिए नया मार्ग खोलना भी चीन की ओर से मित्रता का बड़ा हाथ माना जा रहा है। यह सब सभ्यता और संस्कृति के अधिष्ठान को मजबूत रखते हुए किया जा रहा है। राजनय और अर्थशास्त्र के साथ मोदी की संस्कृति आधारित नीतियां नया रूपाकार लेती दिख रही हैं। न केवल मोदी की चीन यात्रा से चीन में योग के प्रति अनुरागी नागरिकों को बल मिलेगा, बल्कि चीन जाने वाले भारतीयों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी। चीन के साथ हमारे दो हजार साल से भी अधिक पुराने संबंध हैं, और यदि 1962 को छोड़ दिया जाए, तो यह संबंध संस्कृतिमूलक और आत्मीय रहा है। भारत के कुमारजीव, कश्यप, समंत भद्र जैसे ऋषि आज भी चीन में आदर से याद किए जाते हैं। कुमारजीव को तो चीन के तंग वंश के शासकों ने चीन का राजगुरु भी घोषित किया था।

चीन के प्रति भारत की सबसे बड़ी कमजोरी सैन्य शक्ति में कमी नहीं, बल्कि सामान्य जन में जानकारी का अभाव है। हम आज भी अमेरिका और यूरोप के बारे में जितना जानते हैं, उसका दसवां हिस्सा भी चीन के बारे में नहीं जानते। इसके लिए जरूरी है कि दोनों देशों में जनता के स्तर पर आवाजाही और आदान-प्रदान बढ़े। साथ ही, चीन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास को भारतीय दृष्टि से देखने-समझने की जरूरत है, न कि पश्चिमी संवाद एजेंसियों की रिपोर्टों से। चीन से आने वाले व्यापारियों और अकादमिक बुद्धिजीवियों तथा पर्यटकों के लिए वीजा में सरलता दिया जाना आवश्यक है।

मोदी की यह चीन यात्रा आशंकाओं के सागर में विश्वास का हिमालय खड़ा करने जैसी चुनौती से भरी है, तो दोनों देशों के विराटकाय नेता यह संभव बना सकते हैं, इसमें भी संदेह नहीं।
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