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दोस्ती की मजबूत डोर में

Mon, 26 Jan 2015 01:04 AM IST
मनोज जोशी
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जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत की धरती पर कदम रखा, तो ह्वाइट हाउस ने ट्वीट किया, 'राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि बनना और भारत-अमेरिका दोस्ती के नए अध्याय की शुरुआत करना सम्मान की बात है। जय हिंद...' ओबामा ने स्वयं भी कहा कि जैसा स्वागत उनका किया गया, उसकी तुलना मुश्किल है। इसकी वजह भी है। भारत ने इससे पहले कभी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को यह सम्मान नहीं दिया, जबकि उसने एक बार एक चीनी, और दो बार पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया था। ओबामा अपने आखिरी राष्ट्रपति काल के मध्य में एक ऐसी स्थिति में हैं, जहां अमेरिकी संसद विपक्षी पार्टी के नियंत्रण में है।
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इसके बावजूद नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि अमेरिका से बेहतर और करीबी रिश्ता उनकी विदेश नीति का आधार बने। मोदी ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के दो निकट सहयोगियों-जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ जैसा दोस्ताना संबंध बनाया है, यह इससे भी झलकता है। अमेरिका पिछले पांच वर्षों से यही तो चाहता था। लेकिन यूपीए सरकार चीन को नाराज नहीं करना चाहती थी।

अमेरिका जानता है कि भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जहां न सिर्फ उसके निवेश का अच्छा प्रतिफल मिल सकता है, बल्कि जहां उसके उत्पादों को भी बाजार मिल सकता है। बेशक जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे सहयोगी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन दोनों में से कोई भी इतना बड़ा नहीं है कि चीन की विराट भूराजनीतिक स्थिति पर असर डाल सके। एक अरब से अधिक की आबादी, अपने भौगोलिक विस्तार और आर्थिक उछाल जैसी विशिष्टताओं से भरा भारत ही ऐसा कर सकता है।
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चीन उन देशों की सूची में सबसे ऊपर है, जो अमेरिका को विश्व शक्ति के पद से हटाना चाहते हैं। भारत के हित में यह है कि वह चीन के बाद दूसरे नंबर पर है, और पहले नंबर पर पहुंचने से बहुत दूर है। चीन खुद को अमेरिका की जगह विश्व शक्ति के रूप में देखने लगा है, जबकि भारत को दक्षिण एशिया में भी अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने में मुश्किल आ रही है।

भारत के पास कच्चा तेल नहीं है, जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। न ही इसके पास कम्युनिज्म या इस्लाम जैसी विचारधारा है, जो अमेरिकी हितों को आकर्षित करे। इसके बावजूद अमेरिका भारत के साथ गर्मजोशी भरे रिश्ते का इच्छुक है, तो इसलिए कि यह एक मजबूत अर्थव्यवस्था और शक्तिशाली देश है। अमेरिका ने बहुत साफ शब्दों में कहा कि भारत को विश्व शक्ति बनाने के लिए वह हरसंभव प्रयास करेगा। यह आधुनिकतम तकनीकों के हस्तांतरण के जरिये भी हो सकता है और आर्थिक साझेदारी के जरिये भी-जो भारत में समृद्धि लाएगा। यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और बेहतरीन अमेरिकी सैन्य उत्पादों के निर्यातों के जरिये भी हो सकता है।

अमेरिका को पता है कि भारत नियम-कानूनों के अनुरूप चलता है, और वह चीन की तरह नहीं है, जो अपने ही तरीके से विश्व में अपनी मजबूत छवि बनाना चाहता है। अमेरिका के साथ दोस्ती से हमें भी कम लाभ नहीं है। वह उन्नत तकनीक का एक बड़ा स्रोत है; फिर चाहे वह हवाई जहाज निर्माण में हो, या फिर ऊर्जा और कृषि के क्षेत्र में। इस दोस्ती के परोक्ष लाभ भी हैं। भारत और अमेरिका के बीच अच्छी दोस्ती का फायदा हमें उन देशों में मिल सकता है, जो अमेरिका के दोस्त हैं।

ओबामा का स्वागत अमेरिका को एक दोस्त के रूप में खुलेआम स्वीकारने का संकेत तो है ही, कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां उनकी इस यात्रा से हमें कुछ लाभ मिला है। जैसे असैन्य परमाणु समझौते की बाधा दूर हुई है और दोनों देश इसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में भी समझौते हुए हैं। अमेरिका ने इलाहाबाद, अजमेर और विशाखापत्तनम को स्मार्ट सिटी बनाने में मदद करने का भी भरोसा दिया है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता को लेकर भी अमेरिका ने भारत को आश्वस्त किया है।

लेकिन अमेरिका के साथ अपने रिश्ते का पूरा लाभ उठाने के लिए हमें काफी तैयारी करने की जरूरत है। भारत में व्यवसाय करना आसान बनाने के लिए ढांचागत बदलाव इसमें सबसे ज्यादा जरूरी है। इससे अमेरिका को तो लाभ होगा ही, हमारे अपने व्यवसायी भी इस दिशा में सरकार के कदम की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

इसके अलावा भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था, द ऑस्ट्रेलिया ग्रुप ऑन केमिकल वीपन और पारंपरिक हथियारों के निर्यात को नियंत्रित करने वाले द वासेनार एरेंजमेंट जैसे वैश्विक प्रौद्योगिकी उत्पादक समूहों का समर्थन हासिल करने के लिए काफी कुछ करने की जरूरत है, जिसका नियंत्रण अमेरिका के हाथ में है। बिना इन समझौतों के अमेरिका के साथ किए प्रौद्योगिकी संबंधी समझौते का कोई मतलब नहीं होगा, क्योंकि वास्तव में हर प्रौद्योगिकी का आजकल दोहरा उपयोग है-सैन्य व असैन्य। यह सब इस पर निर्भर करता है कि भारत परमाणु उत्तरदायित्व के मुद्दे पर अमेरिका को कैसे संतुष्ट करता है।

भारत और अमेरिका लंबे समय से रणनीतिक भागीदारी की बात कर रहे हैं। लेकिन इस तरह की भागीदारी मूलतः दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों-अफगान-पाक और पूर्वी एशिया के बारे में उनके वैश्विक दृष्टिकोण में समानता पर आधारित होगा। बेशक अपने 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत भारत स्पष्ट रूप से अमेरिका की तरफ बढ़ा है, लेकिन हम इस पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का उद्देश्य क्या है।

जाहिर है, अमेरिका के साथ हम अपने रिश्ते को बराबरी के आधार पर नहीं देख सकते, क्योंकि हम एक-दूसरे के बराबर नहीं हैं। अमेरिका जहां महाशक्ति और दुनिया का सबसे अमीर देश है, वहीं भारत एक कमजोर, गरीब दक्षिण एशियाई देश है। हमारे लिए यह एक बड़ा अवसर है कि हम अमेरिका के साथ अपने इस संपर्क का फायदा उठाएं, जैसा कि 1980 के दशक में चीन ने वैश्विक ताकत बढ़ाने के लिए किया।
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