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हिमाचल में बदलाव तय था

चन्द्र त्रिखा, वरिष्ठ पत्रकार Updated Mon, 18 Dec 2017 08:11 PM IST
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चन्द्र त्रिखा
हिमाचल प्रदेश में जो कुछ हुआ, वह अप्रत्याशित नहीं था। लगभग तय माना जा रहा था कि प्रदेश की जनता पिछले तकरीबन चार दशक से जारी चयन परंपरा कायम रखेगी। यह प्रदेश देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक शालीन और संतुलित बर्ताव में विश्वास रखता है। राष्ट्रीय स्तर के आक्रोश अथवा सुलगते हुए मुद्दों से यहां के मतदाता को कोई अधिक सरोकार नहीं रहता। उसे बदलाव में कम और सबको बारी-बारी से अवसर देने में अधिक विश्वास है। चुनावी अभियान के साथ ही लगभग यह तय हो गया था कि इस बार मौका भाजपा को मिलेगा और कांग्रेस को पांच वर्ष तक प्रतिपक्षी बेंचों में बैठना होगा। चुनावी नतीजों ने इसी परंपरा की पुष्टि की है। हिमाचल ने अपनी परंपरा कायम रखी। निरंतरता के स्थान पर हर बार बदलाव।


पांच वर्ष पूर्व का आंकड़ा, सिर्फ पार्टी का नाम बदलकर थोड़े फेरबदल के साथ कमोबेश दोहराने का प्रयास हुआ। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने 36 स्थानों पर जीत दर्ज की थी, भाजपा को तब 26 सीटें मिली थीं। तब छठी बार मुख्यमंत्री बने थे वीरभद्र सिंह, लेकिन निरंतरता कभी भी कायम नहीं रख पाए थे। वैसे यह प्रदेश कई अर्थों में अपना वैशिष्ट्य बनाए हुए है। पर्वतीय राज्य होने के बावजूद इसके 90 प्रतिशत क्षेत्रों में बिजली की रोशनी है। लिंग अनुपात भी देश में सर्वाधिक संतुलित है। देश के किसी भी राज्य में 999-1,000 का अनुपात नहीं है। लगभग 83.75 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। इस दृष्टि से देश में इसका पांचवां स्थान है और औसत उम्र भी 67 वर्ष के आसपास है। देश में टीवी संख्या के मामले में यह प्रदेश चौथे स्थान पर है। यानी जागरूकता का स्तर कायम है। 


वीरभद्र सिंह ने इस बार भी पूरी शालीनता व विनम्रता के साथ अपनी पार्टी की पराजय स्वीकार की है। उनकी शालीनता का ही तकाजा रहा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी जनता ने उनकी शख्सियत को चुनौती नहीं दी। वह इस बार भी चुनाव जीते हैं और उनके पुत्र विक्रमादित्य भी चुनावी बिसात पर विजय दर्ज कराने में सफल रहे हैं।


उत्तराखंड व हिमाचल, दोनों को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन दोनों की राजनीतिक संस्कृति में भारी अंतर है। यहां राजनीतिक दंगल में भी निजी स्तर पर कीचड़ फेंक परंपरा नहीं है। इस बार दोनों ही मुख्य चेहरे अपना चुनाव क्षेत्र बदलकर लड़े थे। वीरभद्र सिंह को तो नए क्षेत्र अर्की ने भी अपना लिया, लेकिन भाजपा के घोषित मुख्यमंत्री-प्रत्याशी एवं पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को अपना चुनाव क्षेत्र बदलना रास नहीं आया। 


यह भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका है। उधर, अनिल शर्मा कांग्रेस से दलबदल कर भाजपा में आए थे। शायद बदलती हवाओं की नब्ज पढऩे का उनको सलीका खूब आता है। वह इस बार भी चुनाव जीत गए। जाहिर है, हिमाचल में निजी जनाधार को ज्यादा अहमियत दी जाती है। इस प्रदेश में मतदाता का रुझान उसी उम्मीदवार के पक्ष में रहता है, जिससे 'राम-राम’ का सिलसिला जारी रहता हो। वैसे इस बार बसपा ने 42 उमीदवार मैदान में उतारे थे और माकपा भी 14 स्थानों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन हिमाचल के प्रबुद्ध मतदाता ने उन्हें प्रासंगिक नहीं माना और अपना नजरिया दोनों मुख्य दावेदारों तक ही सीमित रखा।


भाजपा में इस प्रदेश में जश्न की मुद्रा में होते हुए भी थोड़ी उदासी का माहौल है। जिस शख्स को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया गया हो, उसी का हार जाना इस बात का द्योतक है कि यहां के मतदाता चेहरे देखकर लहरें नहीं गिनता, बल्कि पूरा चुनाव एक बदलाव के मूड में ही लड़ा जाता है। भावी मुख्यमंत्री कौन होगा, यह अभी तय नहीं है, लेकिन इस बार केंद्र से किसी नेता को इस प्रदेश की बागडोर सौंपे जाने की संभावना है। वैसे हिमाचल की जनता यही पसंद करेगी कि धूमल का विकल्प उन्हीं में से चुना जाए, जिनके प्रति जनता ने अपना विश्वास जताया है। 
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