सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए कर्नाटक सरकार को आदेश दिया कि वह कावेरी नदी से रोजाना दस हजार क्यूसेक जल पड़ोसी राज्य को मुहैया कराए। इतना ही नहीं, न्यायालय ने कावेरी निगरानी समिति को तत्काल बैठक करके दोनों राज्यों के लिए जल की मात्रा का निर्धारण करने का भी निर्देश दिया है। उल्लेखनीय है कि बीते दिनों दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच जल बंटवारे के लिए एक फॉरमूला बनाने को लेकर हुई बैठक विफल रहने के बाद यह मामला शीर्ष अदालत में गया था।
कावेरी जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच विवाद की मूल वजह जानने के लिए कावेरी नदी के उद्भव एवं प्रवाह को जानना जरूरी है। पारंपरिक रूप से कावेरी नदी का उद्भव स्थल कर्नाटक के पश्चिमी घाट के कोडागू में तालाकावेरी में है, जो कर्नाटक एवं तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्व इलाके से बहती हुई दक्कन की पहाड़ियों से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसलिए तमाम भौगोलिक एवं व्यावहारिक कारणों से इसके पानी पर दोनों राज्यों का अधिकार बनता है।
बारिश की कमी होने पर कर्नाटक कहता है कि वह तमिलनाडु को पानी देने की स्थिति में नहीं है। जबकि पर्याप्त बारिश की कमी के चलते ही तमिलनाडु कहता है कि उसे अपनी फसलों को बचाने के लिए कावेरी पर निर्भर रहने के अलावा कोई चारा नहीं है।
हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि इस मुद्दे पर वह दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के संपर्क में है, लेकिन तमिलनाडु सरकार का आरोप है कि चूंकि कर्नाटक में 2013 में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, इसलिए केंद्र सरकार कर्नाटक पर पानी देने के लिए सख्त दबाव नहीं डालती है। एक तरफ जहां तमिलनाडु जोर देकर कहता है कि कर्नाटक को बिना देर किए पानी छोड़ना चाहिए, वहीं कर्नाटक ऐसा करने से मना कर रहा था।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार के मुताबिक, तमिलनाडु को पानी दिए जाने को लेकर उनके राज्य में असंतोष है। हम उसे पानी देने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि पेयजल आपूर्ति, खेतों में लगी फसलों की सिंचाई और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए पानी की जरूरतों के कारण तमिलनाडु के लिए पानी बचता ही नहीं है। पिछले हफ्ते द्विपक्षीय वार्ता के दौरान तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने खेत में खड़ी फसलों को बचाने के लिए कर्नाटक से तीन हजार करोड़ क्यूबिक फीट पानी अगले 15 दिनों में छोड़ने का आग्रह किया था, लेकिन जगदीश शेट्टार ने मना कर दिया।
जयललिता का कहना था कि अगर कर्नाटक ने पानी नहीं छोड़ा, तो तमिलनाडु के किसानों के समक्ष भारी संकट पैदा हो जाएगा। इसके जवाब में शेट्टार का कहना था कि कर्नाटक के कावेरी बेसिन जलाशय में मात्र 3.7 हजार करोड़ क्यूबिक पानी है, जिसमें से दो हजार करोड़ क्यूबिक पानी की जरूरत बंगलुरु व अन्य शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में पेयजल के लिए है। इसके बाद एक हजार करोड़ क्यूबिक पानी पर्यावरण के लिए है, तथा बाकी बचा मात्र 0.7 हजार करोड़ क्यूबिक पानी सिंचाई के लिए है। अगर इसमें से तीन हजार करोड़ क्यूबिक पानी तमिलनाडु को दे दिया जाता है, तो सोचा जा सकता है कि भविष्य में कर्नाटक में पानी को लेकर क्या स्थिति होगी।
एक घंटे से भी कम समय तक चली उस बैठक में दोनों राज्यों के बीच खाई चौड़ी ही हुई और दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम रहे। नतीजतन मामला शीर्ष अदालत के पास चला गया था। इस मामले में संतोष की बात यही है कि पंद्रह वर्षों के बाद पहली बार दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई थी। इससे पहले 1997 में चेन्नई में एम करुणानिधि और जे एच पटेल के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई थी।
कर्नाटक का तर्क है कि तमिलनाडु के पास आगामी मौसम में दीर्घकालीन फसलों को बचाने के लिए मौजूदा भंडार एवं भूजल पर्याप्त है। मेट्टूर बांध में करीब 16 सौ करोड़ क्यूबिक फीट पानी है और इसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा तमिलनाडु में बारिश का मौसम अब तक खत्म नहीं हुआ है। लेकिन तमिलनाडु दूसरी बात कहता है, मेट्टूर बांध में न्यूनतम भंडारण एवं पेयजल जरूरतों के बाद मात्र करीब छह सौ करोड़ क्यूबिक फीट पानी बचा है, जो कुछ ही दिनों की सिंचाई के लिए पर्याप्त होगी। ऐसे में यदि कर्नाटक पानी नहीं छोड़ता, तो खेत में खड़ी दीर्घकालीन फसलें सूख जाएंगी और किसानों के समक्ष संकट खड़ा हो जाएगा।
अगर किन्हीं दो राज्यों के बीच किसी मसले पर विवाद उत्पन्न होता है, तो केंद्र सरकार ही उस पर फैसला लेती है। हालांकि केंद्र सरकार ने कावेरी जल विवाद मुद्दे पर काफी सावधानी बरती है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत के मुताबिक, उन्हें उम्मीद है कि कावेरी जल विवाद का मुद्दा जल्द सुलझ जाएगा।
दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के संपर्क में रहने का दावा करते हुए वह इसे बहुत पुराना, जटिल एवं संवेदनशील मसला बताते हैं और कहते हैं कि उन्होंने दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच हुई बैठकों की विस्तृत जानकारी तलब की है। वह उम्मीद जताते हैं कि दोनों राज्यों को सभी प्रकार के तकनीकी सहयोग प्रदान करने पर वे मैत्रीपूर्ण ढंग से इस मसले को सुलझाने में कामयाब होंगे और एक दूसरे की समस्याओं को समझेंगे। ऐसी उम्मीद सिर्फ केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को ही नहीं है, बल्कि सभी चाहते हैं कि मैत्रीपूर्ण ढंग से इस समस्या का समाधान होना चाहिए, क्योंकि दोनों राज्यों के हजारों किसानों एवं उनके परिवारों का जीवन दांव पर लगा हुआ है।
- लेखक चेन्नई के वरिष्ठ पत्रकार हैं