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पहले काम करो, फिर उसे बताओ

Thu, 06 Dec 2012 10:04 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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जनता के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह रहती है कि पहले तो उसके भले के लिए काम करो। फिर उसे समझाओ भी। अगर आप नहीं बताओगे, तो उसे अपनी समझ से कभी समझ नहीं आएगा। नहीं बताया, तो हो सकता है उसे पता ही नहीं चले कि सरकार ने यह काम किया भी है। यही सबसे बड़ा खतरा है। इस चक्कर में सरकारें उलट जाती हैं।
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सरकार पहले तो पूरे पांच साल काम करती है, फिर उसे काम से ज्यादा मशक्कत इसमें करनी पड़ती है कि जनता को बताया कैसे जाए। अगर जनता पढ़ी-लिखी होती, तो कोई बात नहीं थी। अखबार-टीवी, पत्रिका में विज्ञापन छपवा देते। छपवाते तो अब भी हैं, मगर जनता तो जनता है।

अब आपने सड़क बना दी, मगर जनता है कि उन सड़कों तक कभी पहुंची ही नहीं, क्योंकि हो सकता है पहुंच-मार्ग नहीं बन पाया हो। ऐसे में सरकार को बताना ही पड़ता है न कि भैया, देखो हमने यह सड़क बनाई है। लोग पानी तो रोज पीते हैं, मगर नहीं सोचते कि यह पानी कहां से और कैसे आ रहा है। इन्हें तो यही भ्रम रहता है कि हमने जो जल-कर अदा किया है, उसी से पानी मिल रहा है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि जनता को बताया जाए कि पानी लाने के लिए पाइप सरकार ने ही डाले हैं।
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एक-एक काम गिनाना पड़ता है। अब प्रति व्यक्ति आय बढ़ा दी सरकार ने गरीब आदमी की! मगर उसे तो जितना भी मिले, कम ही लगता है! उसे याद ही नहीं रहता कि पांच साल पहले उसकी दैनिक आय तेरह रुपये थी, जो अब चौदह रुपये दो आने हो गई है। राशन की दुकान पर दो किलो के बजाय सवा दो किलो गेहूं मिल रहा है, किसे पता है, कौन याद रखता है।

विपक्ष तो उनको याद दिला देता है कि यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, मगर सरकार क्या करे! होना तो यही चाहिए कि जनता ही बताए विपक्ष को कि देखो ये-ये काम किए हैं सरकार ने। मगर जनता को यह भी पता नहीं चलता कि सरकार ने उसके लिए क्या-क्या किया है।

काम करने से ज्यादा खर्च तो इसे बताने में हो जाता है। फिर कहा यह जाता है कि सेठों से पैसा ले रहे हैं, चंदा ले रहे हैं। न लें, तो जनता को बताएं कैसे! और नहीं बताया तो गई सरकार हाथ से। फिर कहा यह जाता है कि काम किया है, तो प्रचार करने की क्या जरूरत है! चुनाव लड़कर देखो। जो नहीं किया है, वह भी न बताने लगो, तो कहना!
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