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पुलिस व्यवस्था सुधरे तो बात बने

Thu, 11 Oct 2012 09:07 PM IST
शिवदान सिंह
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अपराधों की जांच के मामले में राज्य सरकारों की उदासीनता पर केंद्रीय गृह सचिव की चिंता बिलकुल जायज है। उनके अनुसार राज्य पुलिस का पूरा ध्यान केवल कानून-व्यवस्था एवं राजनीतिक नेताओं और बाहुबलियों को सुरक्षा प्रदान करने में ही लगा रहा है। ज्यादातर अपराधों में तसल्लीबख्श पैरवी न होने से अपराधी छूट जाते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद अभी तक देश के किसी भी थाने में फिंगरप्रिंट जैसे साक्ष्य तक को उठाने के संसाधन नहीं हैं। प्रदेश की राजधानियों को छोड़ कहीं भी अपराध अन्वेषण की यूनिटें नहीं हैं। नतीजतन पुलिस अधकचरे साक्ष्य जुटाती है, जो कानून की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
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पुलिस की दूसरी सबसे बड़ी कमी है इसका राजनीतिकरण और नौकरशाहों का दबाव। यदि मीडिया का दबाव न हो, तो ज्यादातर बड़े अपराधों में पुलिस प्राथमिकी तक दर्ज न करे। सब जानते हैं कि गीतिका शर्मा आत्महत्या मामले में दिल्ली पुलिस ने शुरू में गोपाल कांडा को फरार होने दिया, परंतु मीडिया के दबाव में उसे चुस्ती दिखानी पड़ी। डॉक्टर सचान की हत्या के मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि लखनऊ जेल में एक विचाराधीन कैदी की मौत होती है और प्रदेश की पुलिस हत्या की प्राथमिकी तक दर्ज नहीं करती।

लखनऊ उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद ही हत्या की प्राथमिकी दर्ज हो पाई। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि दिल्ली की फोरेंसिक प्रयोगशाला में 4,000 विसरा अन्वेषण के इंतजार में पड़े हैं। अब जब विसरा की जांच ही नहीं होगी, तो किस प्रकार इनके अपराधों में अपराधियों को सजा मिल सकेगी? पुलिस की समस्या केवल यह नहीं है कि साक्ष्य जुटाने का काम सही तरह से नहीं हो पाता, बल्कि यह भी है कि वह संसाधनों के अभाव में अदालतों में अभियुक्त के खिलाफ पूरी क्षमता से पैरवी भी नहीं कर पाती। नतीजतन अपराधियों के दोषसिद्ध होने की दर बहुत ही कम है।
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कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्य का विषय है, जिसमें केंद्र सरकार केवल सलाह दे सकती है। अब भी देश में 1861 का पुलिस ऐक्ट लागू है, जिसे उपनिवेशवादी ब्रिटिश सरकार देश में अपना शासन मजबूत करने के लिए लाई थी। यह कानून पुलिस को सत्ताधारी दल और राज्य सरकार की कठपुतली बनाकर रखता है। देश में पुलिस सुधार लागू करवाने के लिए जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में पूर्व आईपीएस अधिकारी रिवैरो की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी, जिसने आठ खंडों में पुलिस सुधारों पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई।

इस रिपोर्ट को लागू करवाने के लिए पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के जरिये इन सुधारों को लागू करवाने के लिए 2006 में मुकदमा दायर किया था। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 2006 में पुलिस सुधार के सात सूत्रीय निर्देश पारित किए, जिसका मुख्य फोकस था- पुलिस को राजनीतिक दबाव से निकालकर कर्तव्यपरायण बनाना, जो अमीर-गरीब सबको कानून की नजर से देखे। इन निर्देशों के पालन के लिए न्यायालय ने जनवरी, 2007 तक इनके पालन का शपथपत्र हर राज्य और केंद्र सरकार को दाखिल करने के लिए कहा। लेकिन आज तक किसी भी राज्य सरकार ने इस प्रकार का शपथ पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि वे पुलिस के ऊपर से अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहतीं।

संविधान द्वारा दिए अधिकारों की सुरक्षा करना सरकार की प्रथम जिम्मेदारी है। पर हमारे देश की पुलिस राष्ट्रीय पुलिस न होकर सामंतशाही व्यवस्था की तरह हो गई। भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के विरुद्ध देश में आंदोलन हो रहे हैं। पर ये आंदोलन मूलभूत सुधारों की बात नहीं कर रहे। पुलिस व्यवस्था के दुरुस्त हुए बगैर कुछ ठीक नहीं हो सकता। सच्चा प्रजातंत्र तभी होगा, जब जनप्रतिनिधियों का सही चुनाव हो और ये पुलिस और न्याय व्यवस्था को सुधारें। इससे लोगों का व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा और हमारा समाज भी अपराधमुक्त होगा।
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