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वे जो स्वच्छता की बात करते हैं

Thu, 11 Oct 2012 01:36 AM IST
कुमार प्रशांत
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कभी मंदिर-मसजिद को एक पलड़े पर रखने के कारण देश में आग लगी थी। अब केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश मंदिर-शौचालय को एक पलड़े पर रखकर देश को परेशान कर रहे हैं। वैसे भी जयराम रमेश हमेशा ही पार्टी और सरकार के लिए परेशानी पैदा करते रहे हैं और अकबर-बीरबल की कहानी वाले बीरबल की तरह जहां भी भेजे जाते हैं, अपने पर आ जाते हैं। इस बार उन्होंने कहा कि जीवन में सफाई बहुत आवश्यक है, इसलिए मंदिरों से कहीं ज्यादा जरूरी है कि देश में शौचालय बनें। वैसे देखें, तो बहुत ही निर्दोष बात कही उन्होंने, लेकिन ऐसी बात कही, जैसी बात कहने का वातावरण और मानसिकता इस देश में बची नहीं है। उनके ऐसा कहने के बाद दो ही प्रतिक्रियाएं उभरी हैं- एक, संघ परिवार की, जिनके लोग पुतले जलाते हुए सड़कों पर उतर आए, और दूसरी सत्ताधारी पार्टी की, जिसने हवा का रुख भांपकर जयराम से राम-राम कर लिया। अब जयराम रमेश या किसी को भी यह समझने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि ये दोनों एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक सत्ता पाने की बेहाली में अंधा हुआ जा रहा है और दूसरा सत्ता गंवाने के भय से।
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हम इस राजनीतिक सचाई को समझें कि आज राजनीतिक पार्टियां बची नहीं हैं। आसान तरीके से कहें, तो पार्टी का मतलब होता है किसी निश्चित विचार में भरोसा करने वालों का संगठन। पार्टी या विचार की यह पूरी सोच ही आज अर्थहीन बना दी गई है। अब बचे हैं सत्ता के समीकरण, जो रोज बनते-बदलते हैं। देश के राजनीतिक वर्ग द्वारा जिस तरह और जिस स्तर पर समाज में असहिष्णुता फैलाई जा रही है और हर किस्म की संकीर्णता को हवा दी जा रही है, उसका उलटवार होना ही है।
अपने व्याख्यान के बाद की स्थिति से जयराम रमेश को इसका एहसास हुआ हो, तो उन्हें भी अब सावधान हो जाना चाहिए। स्वच्छता ईश्वर के बराबर होती है। महात्मा गांधी का यह वाक्य पता नहीं, स्कूल की वाद-विवाद प्रतियोगिता से लेकर विद्वतापूर्ण विश्लेषणों तक में जयराम रमेश सहित हम सबने कितनी ही बार उद्धृत किया होगा। जब गांधी जी ने यह कहा, तब हमसे किसी ने नहीं कहा कि आपने ऐसा कहकर ईश्वर का अपमान किया है।
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गांधी जी ने ऐसा कहकर हमारी समझ और संवेदना का विस्तार किया। स्वामी विवेकानंद ने तो इससे भी सीधी और खतरनाक बात कही कि भगवान को भी रोटी की शक्ल लेकर ही गरीब के पास जाना होगा। उन्होंने तवे पर उलटी-पलटी जा रही गेहूं की रोटी को पलड़े पर रखकर भगवान से भारी साबित कर दिया। किसी ने प्रतिवाद में आवाज नहीं उठाई, बल्कि स्वामीजी की बात से भूख के प्रति देखने की हमारी नजर नई बनी, विकसित हुई और समाज को रोशन कर गई। लेकिन आज हर तरह की असहिष्णुता को जिस तरह हवा दी जा रही है और उसके समर्थन में जैसे हैरतअंगेज तर्क रखे जा रहे हैं, उसके बाद क्या जयराम रमेश इस मुगालते में हैं कि वह इसमें से कोई रचनात्मक नजरिया उभार लेंगे? वह इस पर नहीं बोलेंगे, लेकिन जब सवाल उठा कि सोनिया गांधी के इलाज और विदेशी दौरों पर सरकार का कितना खर्च हुआ, तो इसका जवाब वह गाली-गलौज नहीं था, जो कांग्रेस की तरफ से बरसाया गया। किसी भी सवाल का सीधा जवाब समाज की मानसिकता को समतल बनाने के काम आता है। जबकि गाली-गलौज से जो माहौल बन रहा है, वह हम देख ही रहे हैं।

इस बीच अरविंद केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर गैर-कानूनी और अनैतिक तरीके से कमाई का आरोप लगाया है। उसका जवाब क्या होगा? गालियां? उनकी मंशा पर शंका? केजरीवाल देश के एक जिम्मेदार सामाजिक-राजनीतिक कर्मी हैं और देश उनकी बातों को गंभीरता से लेता है। वह जो कह रहे हैं, उसका उनके पास दस्तावेजी प्रमाण भी हैं। अब वाड्रा सत्ताधारी पार्टी के सदस्य हैं या नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन कांग्रेस जिस तरह उनके बचाव में और केजरीवाल पर हमला करने उतर आई है, उससे यही साबित होता है कि सत्ताधारी पार्टी उनसे अपना खास रिश्ता मानती है। उस रिश्ते की शान इसमें थी कि पार्टी या सरकार या वाड्रा सारी स्थिति को साफ करने वाला दस्तावेजी बयान लेकर देश के सामने आते। या फिर दूसरा रास्ता था कि कांग्रेस या सरकार या फिर वाड्रा मानहानि का मुकदमा दायर कर केजरीवाल को अदालत में खींचते। लेकिन हमारा राजनीतिक वर्ग ऐसे रास्ते चुनने की नैतिक शक्ति खो चुका है।

महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाला सामने आया। इससे शरद पवार के राजनीतिक रसूख को ऐसी ठेस लगी है, जैसी पहले कभी नहीं लगी थी। इसके राजनीतिक परिणाम तो भविष्य में नजर आएंगे, लेकिन अभी इस मामले में भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी बधाई योग्य हैं। उन्होंने बात-बात में कह दिया है कि शरद पवार के खिलाफ मैं कोई विवाद नहीं खड़ा करूंगा, क्योंकि जहां तक आर्थिक व्यवहार की बात है, तो मैं उनका और वह मेरा काम करते रहते हैं। यानी तमाम मतभेदों के बावजूद निहित स्वार्थ राजनीतिक वर्गों को एक-दूसरे से जोड़ता है। ऐसे में आप स्वच्छता की तमाम बातें करें, पर दिमाग गंदगी से भरा हो, तो क्या होगा? शौचालय बनाने की परियोजनाओं से भी बदबू आने लगेगी, जैसे मनरेगा से आने लगी है। मन की सफाई के शौचालय कहां बनेंगे? यहीं से सारे सवाल शुरू होते हैं और सारे जवाब भी यहीं कहीं हैं। क्या हमारा राजनीतिक वर्ग इसे समझने और खोजने की जहमत उठाएगा।
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