गांधी जी के बेटे और राजाजी की बेटी के विवाह की कहानी बचपन से ही मेरे मन में बसी हुई थी। देवदास और लक्ष्मी के प्रेम कहानी को भारत के मध्यम वर्ग में काफी पसंद किया जाता था। इसने मेरे माता-पिता को भी प्रेम विवाह में इंतजार करने के लिए प्रेरित किया था। उन्हें भी प्रेम विवाह करने के लिए पांच वर्षों का इंतजार करना पड़ा था। मेरे लिए यह बड़े ही सौभाग्य की बात थी कि मुझे देवदास और लक्ष्मी गांधी के चारों बच्चों को जानने-समझने का मौका मिला।
उन भाई-बहनों में जिनसे मैं सबसे पहले मिला, वे रामचंद्र (रामू) थे, जबकि देवदास के सबसे छोटे बेटे लोक सेवक और लेखक गोपालकृष्ण मेरे सबसे ज्यादा करीबी हैं। हमारी दोस्ती 1980 के दशक के अंत में हुई, जब हम दोनों दिल्ली में काम करते थे। गोपाल गांधी के घर पर ही मेरी पहली मुलाकात उनकी बहन तारा से हुई, जो खादी की विशेषज्ञ हैं और हिंदी, बंगाली, इतालवी और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में बेहद निपुण हैं। गोपाल ने ही मुझे अपने दूसरे भाई राजमोहन से भी मिलवाया, जिनका नब्बेवां जन्मदिन 7 अगस्त को मनाया गया।
जब मैं पहली बार 1990 में राजमोहन गांधी से मिला, तो वे एक संसदीय चुनाव लड़कर हार चुके थे। इससे एक साल पहले उन्हें अमेठी में लोकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के रूप में चुना गया था। इसे असली गांधी बनाम नकली गांधी की लड़ाई के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसमें महात्मा के एक प्रामाणिक वंशज और एक ऐसे व्यक्ति के बीच मुकाबला था, जो संयोगवश उनका उपनाम रखता था। राजमोहन के पास नैतिकता तो थी, लेकिन पैसा नहीं था। उस समय नेहरू परिवार का गढ़ माने जाने वाले अमेठी में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि राजीव गांधी की पार्टी ने अपना बहुमत खो दिया और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए। राजीव गांधी को कड़ी टक्कर देने के पुरस्कार स्वरूप वीपी सिंह ने राजमोहन को राज्यसभा का सदस्य बना दिया।
लंबे कद और मोटे चश्मे वाले राजमोहन गांधी में विशिष्टता और गंभीरता झलकती है। वे बहुत ही सावधानी से धीरे-धीरे बोलते हैं। उनमें रामू जैसी वाकपटुता और शरारती हास्य-बोध का अभाव है। उनसे पहली मुलाकात में ही यह स्पष्ट हो गया था कि राजमोहन एक बेहद प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इसके कुछ समय बाद मैंने उनके द्वारा लिखी राजाजी और वल्लभ भाई पटेल की जीवनियां पढ़ीं और उनसे बहुत प्रभावित हुआ। राजमोहन गांधी ने उदारवादी मूल्यों को बढ़ावा देने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘हिम्मत’ की स्थापना और संपादन भी किया था। आपातकाल के दौरान इसने सेंसर बोर्ड का डटकर सामना किया, लेकिन बाद में पैसों के अभाव में बंद हो गई।
गोपाल के जरिए राजमोहन से मुलाकात होने के बाद मैंने शीघ्र ही उनसे अलग से भी मिलना शुरू कर दिया। हर मुलाकात में मुझे देश के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती थी। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली, बंगलूरू, पंचगनी और ईस्ट लांसिंग, मिशिगन में मेरी उनसे लंबी बातचीत हुई है। मैं उनकी किताबें और निबंध पढ़कर प्रेरणा लेता रहा हूं। राजमोहन और मेरे बीच छपे हुए विषय को लेकर सिर्फ एक बार असहमति हुई है, जिसे अब याद करना बहुत मामूली लगता है।
मैं एक ऐसे परिवार में पला-बढ़ा हूं, जो महात्मा गांधी से अधिक नेहरू की प्रशंसा करता था। एक युवा स्कॉलर के रूप में जब मैं भारतीय पर्यावरणवाद पर शोध कर रहा था तो मैंने नेहरू के प्रति अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया, क्योंकि उनकी सरकार ने आर्थिक विकास के मॉडल को ‘आक्रामक’ रूप से अपनाया था, भले ही पर्यावरणीय स्थिरता पर इसके परिणाम नकारात्मक हों। यह राजमोहन गांधी ही थे, जिन्होंने मुझे नेहरू को बुराई का प्रतीक बताने से बचाया, जैसा कि मेरे पर्यावरणवादी मित्र उस समय कर रहे थे। अपनी किताब ‘द गुड बोटमैन’ में उन्होंने बताया है कि आर्थिक नीति पर मतभेद के बावजूद नेहरू ही गांधी के उत्तराधिकारी थे। महात्मा गांधी के तमाम अनुयायियों के बीच नेहरू ही महात्मा के समावेशी दृष्टिकोण को समझने और उसे व्यवहार में लाने के सबसे उपयुक्त थे। अपने गुरु की तरह भारत के पहले प्रधानमंत्री एक हिंदू थे, जिन पर मुसलमानों ने भरोसा जताया था। वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने महिलाओं के समान अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी जी के निकटतम सहयोगियों सी राजगोपालाचारी, मौलाना आजाद, राजेंद्र प्रसाद, जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल किसी में भी नैतिक और राजनीतिक गुणों का यह दुर्लभ संयोजन नहीं था। राजमोहन ने मुझे यह भी बताया कि गांधी जी की हत्या के बाद किस प्रकार नेहरू और पटेल ने अपने व्यक्तिगत मतभेदों को अलग रखते हुए भारत को एकजुट करने का प्रयास किया था। राजमोहन और रामचंद्र गांधी में से रामू को अकेले में या एक बड़े श्रोता समूह के साथ सुनना एक रोमांचक अनुभव होता था। उन्होंने मौखिक परंपरा में ही सबसे अच्छा काम किया। दूसरी ओर, राजमोहन के लेखन में कोई व्यंग्य नहीं है। हालांकि उनके पास अभिलेखों से प्राप्त जानकारी बहुत है।
राजमोहन से देश के बारे में इतना कुछ सीखने के बाद मैं इस लेख को अभिलेखों से प्राप्त एक ऐसी जानकारी के साथ समाप्त करना चाहता हूं, जो शायद ही उनको पता हो। मुझे यह बात वेरियर एल्विन के शोध पत्रों में मिली, जो अंग्रेज से भारतीय बने थे और भारत के जनजातीय लोगों के बड़े विद्वान थे। वह गांधी और नेहरू, दोनों को अच्छी तरह जानते थे। जैसा कि मैंने बताया, राजमोहन के माता-पिता को उनकी शादी की अनुमति देने के लिए उन्हें मनाने में बहुत लंबा समय लगा। आखिरकार जून 1933 में देवदास और लक्ष्मी को पुणे में शादी करने की इजाजत मिल गई। इसके तुरंत बाद गांधी और कांग्रेस द्वारा एक और देशव्यापी सत्याग्रह अभियान शुरू करने की बात होने लगी, जो 1920-22 के असहयोग और 1930-32 के सविनय अवज्ञा आंदोलन की राह पर चलने वाला था। पुणे में महात्मा के अनुयायियों के एक समूह से मिलने पर वेरियर एल्विन ने उन्हें उदास पाया। एल्विन ने एक दोस्त को लिखा, “खुश केवल देवदास तथा उनकी दुल्हन लक्ष्मी थे और पूरी तरह से जेल न जाने के लिए दृढ़ थे।” आखिरकार, सत्याग्रह नहीं हुआ। देवदास को उनके पिता ने जेल जाने का आदेश नहीं दिया। वे और उनकी पत्नी लक्ष्मी दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद सबसे अलग तरीके से चार प्रतिभाशाली भाई-बहनों को पाला।