सोवियत क्रांति के बाद लेनिन या स्टालिन ने अनिश्चित काल के लिए देश का सर्वोच्च नेता बनने की इच्छा कभी सार्वजनिक नहीं की और खुद चीन में माओ ने भी यह नहीं किया। अब चीन की संसद ने बिना किसी बहस के शी जिनपिंग को बेमियादी राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया, मानो पार्टी के महासचिव और केंद्रीय सैनिक आयोग के अध्यक्ष जैसे असीमित अधिकार वाले पद उनके लिए पर्याप्त न हों। चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के पहले सुन यात सेन और चियांग काई शेक तक ने ऐसा करने की जरूरत नहीं समझी थी। कम्युनिस्ट सत्ता के इतिहास में पहली बार सामूहिक नेतृत्व का सिद्धांत त्याग दिया गया। माओ के बाद दूसरे सबसे ताकतवर नेता देंग श्याओ पिंग ने पार्टी और सरकार के अलग-अलग अधिकारों पर जोर दिया था। शी के शासन में वह भी खत्म।
यह चीन में किसी नए अधिनायकवाद की शुरुआत नहीं, संकल्पबद्ध राष्ट्र की सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रकटीकरण है। 'अपमानों की शताब्दी' के प्रतिकार की दिशा में एक बड़े अध्याय का प्रारंभ। पहली बार महासचिव का पद संभालने के बाद शी ने करीब ढाई हजार साल पुरानी 'छद्म राजनीति और राजनय' की परंपरा से हटते हुए एक सशक्त राष्ट्र के स्वप्न का उल्लेख किया था। हांगकांग के प्रेस ने संसद के फैसले को 2020 से 2035 और अंततोगत्वा 2050 तक चीनी जनता के 'महान पुनर्नवीकरण' के रूप में देखा है। 'सौ साल की मैराथन' 2049 में पूरी होगी, जब कम्युनिस्ट सत्ता के सौ साल हो चुके होंगे।
चीनी राज्यसत्ता और इतिहास के अमेरिकी विद्वान माइकल पिल्सबरी को 2009 में छपी चीनी सेना के अधिकारियों को प्रशिक्षित करने वाली, राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी में कार्यरत एक कर्नल की किताब में 'सौ साल की मैराथन' पढ़ने का मौका मिला। सेना को भविष्य के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए तैयार करने का यह एक तरीका है। भारत के नेता और सैन्य अधिकारी ध्यान दें, चीनी सेना की सोच को किस तरह ढाला जाता है।
पिल्सबरी और अन्य अमेरिकी विद्वानों का निष्कर्ष है कि 2050 तक चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका से बहुत बड़ी हो जाएगी, शायद तीन गुनी। चीन तब सेना पर अमेरिका से कहीं ज्यादा खर्च कर रहा होगा। भारत के लिए इसके निहितार्थ क्या हो सकते हैं? सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन के वर्चस्व वाला विश्व कैसा होगा। सब कुछ चीन के अनुकूल रहा, तो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुए शीतयुद्ध के दिनों से अधिक खतरे होंगे। करीब तीन दशक तक अमेरिका के सुप्रीम पावर रहने की अवधि भी शांतिपूर्ण मानी जाएगी। पृथ्वी को नष्ट कर देने में सक्षम सोवियत संघ और अमेरिका, दोनों एक-दूसरे को सीमाओं में रखते थे। वे पुनरुत्थानवादी शक्ति कभी नहीं रहे। दूसरे विश्वयुद्ध के नतीजतन कई देशों में कायम हुई कम्युनिस्ट सत्ता की रक्षा और बिरादरानी कम्युनिस्ट पार्टियों की मदद के जरिये सोवियत प्रभाव का विस्तार मॉस्को का एजेंडा था, तो कम्युनिस्ट प्रभाव को सीमित करते हुए उसे खत्म करना और अमेरिकी पूंजी का निर्बाध फैलाव अमेरिका का लक्ष्य। दुनिया के किसी भी कोने में अमेरिकी इजारेदार कंपनियों के हित संकट में हों, तो वह रक्तिम हस्तक्षेप में संकोच नहीं करता था, जैसा उसने चिली में किया। किसी की जमीन पर कब्जा या अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर एकाधिकार कायम करने की इन दोनों महाशक्तियों ने नहीं सोची।
चीन का मामला बिल्कुल अलग है। उसकी इच्छा तीन सौ साल पहले के गौरवशाली युग में वापस जाने की है। अतीत में जो भी भूमि चीनी शासकों के आधिपत्य में रही, उसे वह आज भी अपनी मानता है और वक्त के मुताबिक, दावा भी पेश कर देता है। उसके पास आर्थिक-सैनिक ताकत है, इसलिए इतिहास का भाष्य वह सुविधानुसार करता है। यह एक दोधारी तलवार है। मसलन, लंबे समय तक वह भी गैर-हान जातियों का गुलाम रहा। तब फिर चंगेज खान के वंशजों को चीन का अधिकांश भूभाग मिल जाना चाहिए। या फिर जनरल जोरावर सिंह की सेना के अंतिम पड़ाव तक का इलाका भारत का हुआ। लेकिन भैंस तो उसी की, जिसके पास लाठी हो। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वोच्च शक्ति बनने के बाद चीन उन समस्त जलमार्गों पर भी दावा करने लगे, जहां से 15वीं शताब्दी में एडमिरल जेंग हे का जहाजी बेड़ा गुजरा था। चीन वैध-अवैध तरीकों से (जैसे, मुद्रा की कीमत में सामरिक खेल और डंपिंग) अपनी पूंजी का विस्तार अमेरिकी तर्ज पर कर रहा है। 2050 तक चीन की पूंजी अंतरराष्ट्रीय इजारेदारी के शिखर पर होगी।
चीन से अभूतपूर्व खतरा इसलिए भी है, क्योंकि उसकी राज्यसत्ता लोकतांत्रिक न होने के कारण बेलगाम और निरंकुश है। याद करें, वियतनाम युद्ध का सर्वाधिक विरोध अमेरिका की सड़कों पर हुआ था। अमेरिकी सरकारों को बेनकाब करने में नेतृत्वकारी भूमिका द न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों की थी। चीन में यह कल्पनातीत है। पर इतिहास का तर्क है कि बड़ी-बड़ी साम्राज्यवादी ताकतें हारी और नष्ट हुई हैं। 1890 तक जर्मनी औद्योगिक क्रांति में ब्रिटेन से आगे निकल गया था। विज्ञान और टेक्नोलॉजी में भी जर्मनी शिखर पर था। लगभग हर क्षेत्र में ब्रिटेन नीचे जा रहा था। ब्रिटेन के नामी शिक्षा संस्थानों में जर्मन भाषा के बगैर काम नहीं चलता था। मात्र तीस साल के अंदर ब्रिटेन ने जर्मनी का भूगोल बदल डाला। वर्साई संधि की अपमानजनक शर्तें और दूसरे विश्वयुद्ध के दुखद परिणाणों को जर्मन जनता आज भी नहीं भूल पाई है।
2050 तक सर्वाधिक शक्तिशाली बनने के बावजूद चीन इतिहास के तर्क की परिधि से बाहर नहीं जा सकता। अमेरिका का ग्राफ नीचे भले जा रहा हो, पर उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकेगा। भारत की भी आर्थिक, वैज्ञानिक और सैन्य ताकत बढ़ती रहेगी। अनुमान है कि 2050 तक भारतीय अर्थव्यवस्था दूसरे नंबर पर होगी। जापान, जर्मनी और रूस की भी शक्ति बढ़ेगी। आने वाले दशकों में उन सारी स्थितियों की संभावना है, जो चीन को खुलकर नहीं खेलने देंगी।