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पाकिस्तानी फौज पर कैसा भ्रम

Wed, 07 Aug 2013 08:47 PM IST
मारूफ रजा
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सीमा रेखा पर हुए हालिया पाकिस्तानी हमले पर, जिसमें देश के पांच सैनिक शहीद हो गए, पाकिस्तान के खिलाफ संसद में और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक है। कहा जा रहा है कि यह हमला भारतीय विशेष बल द्वारा नियंत्रण रेखा पर पिछले हफ्ते पाक अधिकृत कश्मीर के निर्दोष नागरिकों को कैद कर मारे जाने के जवाब में किया गया है। पर इस मामले में हमारे रक्षा मंत्री ए के एंटनी की टिप्पणी सबसे ज्यादा निराशाजनक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारतीय जवानों पर हमला पाक सैनिकों की वर्दी पहने आतंकियों द्वारा किया गया है। ऐसा लगता है कि उन्हें या तो इस घटना की सही जानकारी नहीं है या वह राष्ट्र को भ्रम में रखना चाहते हैं।
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पाकिस्तान के रवैये से जो परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि इस हमले में पाक सेना का हाथ है। नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ाने की पाकिस्तान की मंशा को समझना महत्वपूर्ण है। नवंबर, 2003 से दोनों पक्षों की ओर से नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम लागू है, लेकिन 2009 से उसके उल्लंघन की घटनाएं बढ़ गई हैं। अकेले इस वर्ष अब तक पाकिस्तान की ओर से नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की 57 घटनाएं हो चुकी हैं। पाकिस्तानी सेना को अब मुशर्रफ की विरासत से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन कई कारणों से वह शांति प्रक्रिया से ध्यान भटकाने के लिए वापस नियंत्रण रेखा एवं कश्मीर के मुद्दे को सामने लाना चाहती है।

पाकिस्तानी सेना ने दोनों देशों के बीच दुश्मनी को जिंदा रखने के लिए काफी कुछ दांव पर लगाया है। युद्ध के जरिये भारत से कश्मीर को हथियाने में नाकाम रहने के बाद से पाकिस्तानी सेना भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करती आई है। उसका यह अभियान 1980 के दशक के जनरल जिया के शासन और पिछले तीन दशकों में तेज ही हुआ है। दरअसल, इस हकीकत से रूबरू होने के बाद कि परमाणु संपन्न पड़ोसी युद्ध नहीं लड़ सकते, क्योंकि हालात बेकाबू हो सकते हैं, जनरल जिया ने अपनी मध्ययुगीन सोच के साथ अफगानिस्तान और भारत, दोनों के खिलाफ मुल्ला और मदरसे की मदद से नए तरह का युद्ध छेड़ने का फैसला किया।
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इसके अलावा पाक सेना कश्मीर में अनियमित बलों (अलगाववादियों-कबाइलियों) की आड़ लेती रही है, ताकि वह हमले के आरोपों को नकार सके। ऐसा उसने 1947, 1965 और 1999 के युद्धों में भी किया था। कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की अपने ढंग से व्याख्या कर पाकिस्तानी कट्टरपंथी भरोसा करते हैं कि एक दिन कश्मीर पाकिस्तान के हिस्से में आ जाएगा। मगर 13 अगस्त, 1948 का संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव न तो पाकिस्तान के पक्ष में है और न ही पाकिस्तान के कारण उसे पूरी तरह से लागू किया गया। इस प्रस्ताव के तीन हिस्से हैं, जिसमें कहा गया है कि (1) दोनों सेनाओं को युद्धविराम का पालन करना होगा, जिसे पूरा किया गया। (2) पाकिस्तान पूरे जम्मू-कश्मीर से वापस जाए, जिससे उसने इनकार कर दिया। और (3) जब भारत की इच्छा के अनुरूप पाकिस्तान की वापसी हो जाए उसके बाद ही जम्मू-कश्मीर के लोगों की इच्छा जानने के लिए वहां जनमत संग्रह कराया जाए। हालांकि पाकिस्तानी यही मानते हैं कि प्रस्ताव केवल जनमत संग्रह के बारे में था।

युद्धविराम प्रस्ताव का केवल एक हिस्सा था, जिसे 1948-49 में लागू किया गया और 1972 में शिमला समझौते के बाद युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा के रूप में निरूपित किया गया। लेकिन जनरल मुशर्रफ ने नियंत्रण रेखा की पवित्रता को धता बताते हुए कारगिल का दुस्साहस किया था, जैसी कोशिश उनके पूर्ववर्ती जनरल जिया ने सियाचिन में की थी। लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत के रुख को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान पर नियंत्रण रेखा का सम्मान करने का दबाव बनाया।

ताजा हमला कश्मीर पर पाकिस्तान के दावे की तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने की उसकी पुरानी चाल का ही हिस्सा है। यही नहीं, ऐसा करके पाकिस्तानी सेना न केवल देश में अपनी प्रमुख भूमिका बनाए रखती है, बल्कि भारत से खतरा दिखाकर भारी बजटीय आवंटन भी पाती है।

हालांकि नवाज शरीफ की बातचीत की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की पेशकश को लेकर खासतौर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उत्सुक हैं, क्योंकि उनकी सरकार के पास समय कम है, लेकिन राजनयिक सफलता के लिए काफी तैयारियां करने की जरूरत है। व्यक्तित्व आधारित नीति-निर्माण लंबे समय से भारत के लिए मुश्किल रहा है। लंबे समय बाद भी इस मामले में काफी कुछ हासिल करने की संभावना नहीं है। जैसा कि शर्म अल शेख एवं हवाना बैठक में देखा गया, भावनात्मक रूप से कदम उठाना राष्ट्रहित के लिए नुकसानदेह होता है। राजनय में तैयारी बहुत जरूरी है। हालांकि पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है, लेकिन वह लगातार कूटनीतिक रूप से भारत को चकमा देता है।

पर बड़ा सवाल यह है कि क्या नवाज शरीफ का पाकिस्तानी फौज पर नियंत्रण है और वह जो वायदा कर रहे हैं, उसे पूरा कर सकते हैं? पारंपरिक रूप से पाकिस्तान की भारत, अफगानिस्तान एवं अमेरिका से संबंधित विदेश नीति वहां के राजनेताओं द्वारा नहीं, बल्कि सेना मुख्यालय में सैन्य आकाओं द्वारा तय की जाती है। इसमें जल्दी कोई परिवर्तन नहीं होने वाला। इसलिए भारत-पाकिस्तान के संबंधों में किसी भी तरह की सफलता की संभावना कम है। जनरल परवेज कियानी पाकिस्तान के इतिहास में सबसे ज्यादा भारत विरोधी सैन्य प्रमुख माने जाते हैं। लेकिन वह जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं। तब यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तानी सेना निकट भविष्य में क्या रुख अपनाती है।
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