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काटो नाग जहां मन भावै

Wed, 07 Aug 2013 08:17 PM IST
अशोक सण्ड
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खीझ आ रही है बुजुर्गों की उस नसीहत पर कि जब कोई गाल पर चांटा मारे, तो घूमकर दूसरा गाल उसके सामने कर दो। पुरखों ने कितने जालिमों के आगे दूसरा गाल थप्पड़ खाने के लिए आगे बढ़ाया होगा। धर्म, धैर्य, नैतिकता और समर्पण के पाठ को खाद-पानी देने के लिए शुरुआती तालीम के दौरान लिए सूत्र रटाए जाते-चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग...बेचैन किए हैं ये पंक्तियां। जिस देश की विदेश मंत्री कभी सम्मोहनी हाव-भाव के साथ हम लूटने आए हैं, हम लूटके जाएंगे के अंदाज में हमारा दिल लूटकर गई थी, वहां के सैनिक रह-रहकर ‘ताव’ दिखा रहे हैं।
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उसकी कथनी और करनी में बड़ा फर्क है। उसने दो शरीफाने मीठे बोल क्या बोल दिए, लगा सब दुरुस्त हो गया। उस रात छिटक गई सद्भावना, जब उसने पांच जवानों को लील डाला। सिद्ध हो गया प्रमेय कि हमारा पड़ोसी ‘भुजंग’ है। विष वमन करना उसकी फितरत है। तरीकों में उसके अलबत्ता बदलाव आता है। कभी घुसपैठ, तो कभी आतंकवाद। साल की शुरुआत में उसने हमारे दो जवानों को मारा था। अब फिर अपने पांच सैनिकों की हत्या पर हमारे डिफेंस मिनिस्टर बोल रहे हैं कि उनकी सैन्य पोशाक में यह काम आतंकवादियों ने अंजाम दिया है। वाकई हम ठहरे चंदन। किसी को डाउट हो, तो बताए।

बे-मुरौव्वत दुष्टता और ओछापन है उनके पास। हमारे धैर्य का इम्तिहान ले रहे हैं वे। याद आ रही है नदी में नहाते उस साधु की कथा, जो डूबते बिच्छू को बचाने के चक्कर में हथेली पर डंक की पीड़ा सहता रहा। जाकर जौन स्वभाव जाय नहीं जी से/नीम न मीठी होय लाख सींचौ गुड़-घी से।
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पड़ोसी बार-बार मार रहा है डंक। लेकिन हमारे धैर्य के थर्मामीटर का पारा नहीं लुढ़कने वाला। वह कितना भी कमीनापन दिखाए, नहीं स्खलित होगा हमारा धैर्य। काटो नाग जहां मन भावे का समर्पण भाव। युग धर्म तो यह है-जो तोको कांटा बोवे ताहि बोय तू भाला/वह भी क्या याद करेगा पड़ा था किससे पाला। पहले भी पिट चुका है हमसे वह, लेकिन बाज नहीं आता। हम सद्भावना की बस चलाते रहे, वह आतंकवादी भेजता रहा। हमने समझौता एक्सप्रेस चलाई कि बैठकर आराम से आओ, लेकिन सद्भावना की बस या समझौते की ट्रेन नहीं बदल सकी सिरफिरों का ब्रेन।
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हमारे धैर्य की परीक्षा हो रही है। हम स्वभाव, आदत और इंसानियत से मजबूर अब भी चादर बिछाए बैठे हैं कि कभी तो इस बबूल से आम टपकेंगे।
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