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भारी पड़ेगी किसानों की अनदेखी

वी एम सिंह
Updated Wed, 09 Jan 2019 07:44 PM IST
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वी एम सिंह

पिछले दो दशकों में तीन सौ से ज्यादा किसानों द्वारा खुदकुशी किए जाने के बावजूद सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। पिछले साल ऑल इंडिया किसान संघर्ष को-ऑर्डिनेशन कमिटी (एआईकेएससीसी) और इसके सहयोगियों द्वारा किए गए तमाम आंदोलनों ने यह जताने की भरसक कोशिश की कि किसानों से जुड़े मुद्दे ही देश की पहली प्राथमिकता हैं। हिंदी पट्टी में हुए राजनीतिक बदलाव किसानों की नाराजगी का ही परिणाम हैं। शायद इसीलिए ही सभी राजनीतिक दल आज किसानों की समस्यायों पर चर्चा करने को तैयार दिखते हैं और यही वजह है कि किसान इस उम्मीद में हैं कि इस चुनावी साल में उनकी जरूर सुनी जाएगी।



विडंबना ही है कि साढ़े चार साल बीत गए हैं और केंद्र सरकार अब भी किसानों की समस्यायों का हल नहीं ढूंढ पाई है। और तो और वह इस दिशा में आगे बढ़ती भी नहीं दिखाई दे रही, क्योंकि अगर ऐसा होता, तो वह दो सौ नौ संगठनों के समूह एआईकेएससीसी द्वारा सुझाए गए दो विधानों पर संसद में बहस कर रही होती। कर्ज से मुक्ति और निश्चित एमएसपी की हमारी मांग स्वामीनाथन रिपोर्ट पर ही आधारित है। ऐसा होने पर न सिर्फ किसानी का पेशा अपना पुराना गौरव हासिल कर सकेगा, बल्कि करोड़ों युवाओं को इसके जरिये रोजगार मिल सकेगा, जो आज खेती को घाटे का सौदा मान बैठे हैं। अब जबकि विपक्ष के इक्कीस राजनीतिक दलों ने हमारी मांगों पर सहमति दिखाते हुए सत्ता में आने पर इस पर गौर करने की बात कही है, यह जरूरी हो जाता है कि एनडीए सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर बिल पास करे और अपना चुनावी वायदा पूरा करे।


कांग्रेस ने जहां कर्ज माफी करके अपना वायदा पूरा किया, वहीं प्रधानमंत्री इस तरीके को लॉलीपॉप करार दे चुके हैं। यह इस बात का सूचक है कि केंद्र सरकार तेलंगाना के नक्शेकदम पर चलते हुए किसानों को उनके रकबे के हिसाब से नगद मदद देने की सोच रही है, जबकि उसके पास मध्य प्रदेश की भावांतर योजना जैसा विकल्प भी है, जिसमें एमएसपी और बाजार मूल्य के बीच का अंतर पाटने की व्यवस्था है। 

कुछ और समस्याएं हैं, जो इस साल किसानों को परेशान करेंगी। प्राकृतिक रूप से फसलों की बर्बादी उनमे से एक है। इसके उपाय के तौर पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पूरी तरह से कॉरपोरेट हितैषी मालूम होती है। पिछले तीन साल के आंकड़े तो कम से कम यही कहते हैं। सरकारों द्वारा अधिग्रहीत की जाने वाली किसानों की जमीनें एक अलग तरह की चुनौती है। यहां नियमों के पालन में गंभीर खामियां देखने को मिलती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मध्य गंगा नहर परियोजना अधिग्रहण के खेल का सटीक उदाहरण है। इस परियोजना से प्रभावित किसान आज न चाहते हुए भी अपनी जमीनें कम पैसों के बदले सरकार को सुपर्द करने पर मजबूर हैं, जो कि 2013 के भू-अधिग्रहण ऐक्ट का सरासर उल्लंघन है।


उत्तर प्रदेश के पांच करोड़ परिवार सीधे तौर पर गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। गन्ना किसान अपनी बिरादरी में सबसे गए-गुजरे हालात में हैं। साल बीत जाते हैं, उनको भुगतान नहीं किया जाता। खास बात यह कि गन्ना किसानों की समस्या आज की नहीं, बल्कि सत्तर साल पुरानी हो चुकी है। राज्य से लेकर केंद्र में कई सरकारें आई-गईं, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। नेता अमीर मिल मालिकों के एहसानों तले किसानों की फिक्र करना भूल जाते हैं।


देश का किसान अपनी जिंदगी में बदलाव चाहता है। किसानों से जुड़े कई और भी मुद्दे हैं, जिन पर तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। चुनावी वर्ष में कोई जुमला तो खैर बिल्कुल नहीं चलेगा।


-लेखक एआईकेएससीसी के संयोजक हैं।

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