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अहम सवालों पर कमला हैरिस मौन क्यों हैं?

सार

अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए कमला हैरिस के पास अगर वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति से अलग कोई दृष्टिकोण व दूरदृष्टि है, तो वह इसे जाहिर क्यों नहीं करतीं? अमेरिका के लिए आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है।
 
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भारतवंशी कमला हैरिस। - फोटो : PTI


दरअसल, राष्ट्रपति बनने पर उनको विरासत में जो सबसे बड़ी चुनौती मिलने वाली है, वह यह है कि बतौर राष्ट्रपति वह यूक्रेन युद्ध के विषय में क्या करेंगी। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमीर जेलेंस्की हाल ही में जब वाशिंगटन में थे, तब सभी को उम्मीद थी कि हैरिस बाइडन प्रशासन की नीतियों के साथ खड़ी दिखेंगी। हुआ भी ऐसा ही। लेकिन, सभी जानते हैं कि बाइडन प्रशासन की नीति रूस को बगैर उकसाए यूक्रेन की मदद करने की है। जाहिर है कि कमला हैरिस यूक्रेन को लेकर बाइडन प्रशासन की अस्पष्टता से सीखते हुए आगामी राष्ट्रपति चुनाव में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर अपनी जीत सुनिश्चित कर सकती हैं।


दूसरी ओर ट्रंप हैं। वह रूस-यूक्रेन युद्ध तत्काल रुकवाने का दावा कर रहे हैं। ऐसा वह कैसे करेंगे, इस बारे में वह बेशक पत्ते नहीं खोल रहे हैं, लेकिन उनके प्रशंसकों को इससे मतलब भी नहीं है। जाहिर है कि इस स्पष्टता का फायदा उन्हें मिल रहा है। दूसरी तरफ, जब उपराष्ट्रपति कमला हैरिस बयान जारी करती हैं, उनके खुद के प्रशासनिक अमले की तरफ से यूक्रेन की जीत को लेकर संदेह जारी किए जाते हैं। ये संदेश जेलेंस्की की यात्रा के उद्देश्य को ज्यादा हथियारों और ज्यादा दूरी की मिसाइलों पर लगे प्रतिबंध को हटाने की एक कमजोर देश की गुहार तक सीमित कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, ये रूस की गति को कम करने के लिए मदद का आग्रह ज्यादा लगता है, जबकि आधिकारिक तौर पर कीव और वाशिंगटन, दोनों ही युद्ध में जीत से कम कुछ नहीं चाह रहे हैं।


बाइडन प्रशासन ने चतुराई से नाटो के हस्तक्षेप को भी रोका हुआ है। जेलेंस्की की जगह खुद को रखकर सोचें कि आखिर यूक्रेन किस दिशा में बढ़ रहा है। ऐसा लग रहा है कि वह बस प्रतीक्षा कर रहा है कि चीजें कितनी खराब हो सकती हैं। वह भी तब, जबकि दो-तिहाई अमेरिकी यूक्रेन की जीत के पक्ष में हैं। द इकनॉमिस्ट पत्रिका ने अपने ताजा अंक में संख्या, मारक क्षमता और धन-बल में रूस को कहीं आगे दिखाकर अत्यंत निराशाजनक मूल्यांकन पेश किया है। द बुलवर्क के लिए लिखने वाली रूसी-अमेरिकी पत्रकार कैथी यंग का दृष्टिकोण ज्यादा आशावादी है। उनका तर्क है कि वर्तमान रूसी दबाव जल्द ही अपने चरम तक पहुंच सकता है। मास्को उम्मीद कर सकता है कि सर्दियों तक जितनी हो सके उतनी जमीन जब्त कर ली जाए, और फिर संघर्ष विराम होने की स्थिति में यथास्थिति को लेकर सहमति बन ही जाएगी। ऐसी स्थिति में हैरिस प्रशासन के लिए दो तरह की अनिश्चितताएं पैदा होती हैं। त्वरित समाधान की अपेक्षा रखने वाले सवाल ये हैं कि अमेरिका कब तक यूक्रेन की जीत की ऐसी योजना का समर्थन करता रहेगा, जो व्यावहारिक तौर पर संभव ही नहीं है। इसके अतिरिक्त, बाइडन-हैरिस प्रशासन किस सीमा तक ट्रंप के संवाद के जरिये युद्ध के अंत की बात को नकारते रहेंगे, जबकि फिलहाल की स्थितियों में युद्ध के खात्मे के लिए यही आदर्श अमेरिकी नीति लगती है।


दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नवंबर में कौन-सा उम्मीदवार जीतता है। बाइडन और हैरिस, दोनों यही उम्मीद कर रहे हैं कि यूक्रेन खुद ही लड़ाई को उस बिंदु तक पहुंचा दे, जहां से उन्हें संवाद न करने के रुख से कुछ हद तक हटने का मौका मिल जाए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका की विशिष्ट कूटनीति में फिलवक्त खतरनाक स्थितियों से जूझ रहे यूक्रेन की भूमिका क्या है? शुरुआती उम्मीद कि यूक्रेन युद्ध अमेरिका को चुनौती देने वाले एक देश को निष्प्रभावी कर देगा, व्यर्थ ही लगती है। रूस ने अमेरिका के एक अन्य प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ मिलकर सभी चुनौतियों का डटकर सामना किया है। यह रूस-चीन गठजोड़ हालिया वैश्विक परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसके बारे में राष्ट्रीय रक्षा रणनीति आयोग ने हाल ही में कहा है कि यह 1945 के बाद से अमेरिका के सामने आई सबसे बड़ी चुनौती है। यह निष्कर्ष कुछ अत्युक्तिपूर्ण हो सकता है, लेकिन शीतयुद्ध के बाद से पहली बार अगर अमेरिका को लेकर ऐसी बातें उठ रही हैं, तो यह उसके लिए भयावह क्षण है। यह स्थिति मांग कर रही है कि अमेरिका पर्याप्त शस्त्रीकरण और अपने खर्चों में कमी लाने पर ध्यान दे। कुछ स्थितियों में दोनों के संतुलन पर भी ध्यान देना होगा।


अमेरिका की वर्तमान सरकार इस संतुलन में काफी कमजोर दिखी है। अफगानिस्तान में अमेरिका ने कितने प्रयास किए, लेकिन आज वहां की स्थिति क्या है। योजना की स्पष्टता कितनी जरूरी है, अफगानिस्तान में अमेरिका को यही सबक मिला। इस संदर्भ में ताजा रणनीतिक समस्या यूक्रेन की है, जो पश्चिम एशिया से लेकर पूर्व और पूर्वोत्तर एशिया तक फैली कई चुनौतियों की फेहरिश्त में एक है और जो अमेरिका के नए राष्ट्रपति की प्राथमिकताएं निर्धारित करने, प्रतिबद्धताओं को पुन: निर्धारित करने और महंगे इरादों व सीमित स्रोतों को ध्यान में रखकर कार्य करने की क्षमता की पूरी परीक्षा लेगी। अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए कमला हैरिस के पास अगर वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति से अलग कोई दृष्टिकोण व दूरदृष्टि है, तो वह इसे जाहिर क्यों नहीं करतीं? अमेरिका के लिए आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है।

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