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तकनीकी: चिप उद्योग की चुनौतियों से निपटेंगे नवाचार

रजत कुमार मिश्रा Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 01 Oct 2024 07:07 AM IST

सार

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सौ से अधिक स्टार्टअप कार्यरत हैं। नवाचार से वे सस्ती तकनीकें बनाकर एक सशक्त चिप इकोसिस्टम तैयार कर सकते हैं।
 
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सेमीकंडक्टर (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : For Reference Only


इस्राइल के टॉवर सेमीकंडक्टर और अदाणी समूह द्वारा 10 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर चिप निर्माण इकाई को तालोजा (महाराष्ट्र) में और केन्स सेमीकॉन द्वारा आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्ट इकाई को गुजरात के साणंद में निवेश की मंजूरी मिल गई है। इनसे पहले भारत ने पांच चिप संयंत्रों, दो टाटा समूह द्वारा असम और गुजरात में, एक-एक माइक्रॉन और सीजी पावर द्वारा गुजरात में, और आरआरपी इलेक्ट्रॉनिक द्वारा महाराष्ट्र में, को स्वीकृति दी है। बदलाव तेजी से और निरंतर हो रहे हैं, परंतु इन चिपों में ऐसा है क्या?


चिप छोटे इलेक्ट्रॉनिक घटक हैं, जिन्हें सेमीकंडक्टर (जैसे सिलिकॉन) से बनाया जाता है। ये चिप विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, जैसे मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी व वाहनों में प्रोसेसिंग, डाटा स्टोरेज और कंट्रोल कार्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं। इस पूरे उद्योग के तीन मुख्य हिस्से हैं-डिजाइन इसमें चिप व सिस्टम की डिजाइनिंग होती है, मैन्युफैक्चरिंग यानी सेमीकंडक्टर चिपों का उत्पादन तथा तीसरा असेंबली और टेस्टिंग। डिजाइन के क्षेत्र में अमेरिका, मैन्युफैक्चरिंग में ताइवान व असेंबली में चीन विश्व में अग्रणी हैं। चिप, जिसे माइक्रोचिप या इंटीग्रेटेड सर्किट भी कहा जाता है, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट को बहुत छोटे आकार में समाहित करते हैं। आपके छोटे स्मार्टफोन में भी 15 से 25 चिप हो सकते हैं। सिर्फ उपभोक्ता उत्पाद ही नहीं अपितु सेना (टैंक, रडार, प्लेन), अंतरिक्ष, ड्रोन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, गेमिंग, एआर/वीआर या फिर तेजी से बढ़ रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग के क्षेत्र में भी ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सारांश में ये आधुनिक तकनीक की रीढ़ हैं। इसलिए भौगोलिक-राजनीतिक, रणनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।


यही रणनीतिक महत्ता कुछ समय से पूरे विश्व को व्यथित कर रही है और भारत एक निवारक के रूप में सामने आ रहा है। असल में इसकी शुरुआत कोरोना काल से होती है, जब चीन में लॉकडाउन के कारण चिपों की आपूर्ति ठप हो गई और कारों से लेकर सैटेलाइट, लैपटॉप से लेकर मिसाइल तक के उत्पादन और आपूर्ति में दिक्कतें आने लगीं। साथ ही अमेरिका-चीन 'व्यापार युद्ध', चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों द्वारा जासूसी और चीन द्वारा ताइवान को लगातार धमकाना भी अन्य देशों को चेतावनी थी। चीन जो इन चिप बनाने वाले खनिज पदार्थों को भी नियंत्रित करता है, ऐसी किसी भी स्थिति में आसानी से 'आर्म-ट्विस्टिंग' कर सकता है। इसीलिए अमेरिका, यूरोप, इस्राइल, सिंगापुर आदि भारत को सहयोग देने के इच्छुक हैं। भूमि की बहुतायत, सस्ता श्रम और साथ ही बहुत बड़ा घरेलू बाजार भारत की खासियत है। पूरे विश्व की सभी चिप डिजाइन कंपनियों में दरअसल 20 फीसदी कार्यबल भारतीय मूल का है। ये सारे कारक चिप उद्योग को वर्तमान 30-35 अरब डॉलर से 2030 तक 150-200 अरब डॉलर तक ले जा सकते हैं। इन इकाइयों के लिए पैसा और अन्य संसाधन बहुतायत में चाहिए। साथ ही तकनीक स्थानांतरण के बाद भी भारत लंबे समय तक अत्यंत उन्नत चिपों (जैसे 2-3 नैनो मीटर आकर) को शायद न बना पाए, लेकिन बड़े आकर की चिपों (30-200 नैनो मीटर) की मांग घरेलू और वैश्विक बाजार में बहुत अधिक है। इसलिए पहला कदम संख्या बढ़ाना और फिर उन्नयन होना चाहिए।


100 से अधिक स्टार्टअप इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। नवाचार से वे ऊर्जा-कुशल और सस्ती तकनीकें बना सकते हैं। चूंकि इस क्षेत्र के मानक पहले से निर्धारित हैं, तो बेहतर है कि ये स्टार्टअप अपना लक्ष्य तलाशें और खास उपयोगों और समस्याओं पर केंद्रित उत्पाद और कंपनी बनाएं। साथ ही वे टाटा, वेदांता जैसी बड़ी कंपनियों के कंधे पर भी आउटसोर्सिंग, सहयोग, टेस्टिंग आदि के द्वारा सवारी कर सकते हैं। सशक्त और स्थिर चिप इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में अग्रसर भारत को दो-चार अनुबंधों और कुछ वृहद इकाइयों के परे जाकर कंपनियों की छोटी-बड़ी समस्याओं के निवारण पर, चिप क्षेत्र के कौशल विकास को हर कॉलेज में पहुंचाने तथा बड़े स्तर पर अनुसंधान और पेटेंट को सुनिश्चित करने पर कहीं ज्यादा ध्यान देना होगा, तभी हम इस दशक के अंत तक पांचवें सबसे बड़े चिप निर्माता बन पाएंगे।          
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