सच बात तो यह है कि इस तरह की आपदाएं घर-गांव को तो बुरी स्थितियों में धकेल देती हैं, पर कई तरह के नए हीरो भी पैदा कर देती हैं। ऐसे शोर-शराबे में कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। इस तरह की घटनाओं के बाद पूरा उत्तराखंड राज्य ही हताहत दिखाई देता है। सरकारी दावे और उसकी आलोचनाओं का सिलसिला तो एक लंबे समय तक चलता ही रहेगा, क्योंकि आपदाओं के बाद सरकारों को जल्दी मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि यह सरकारों की ही जिम्मेदारी मान ली जाती है, जिसे सब कुछ पटरी पर लाना है। इस तरह की घटनाओं की आड़ में कई अन्य मुद्दे व आलोचनाएं भी शुरू हो जाती हैं, जिनका इस आपदा से कुछ लेना-देना नहीं होता।
इस तरह की घटनाओं में पीड़ितों की सहायता और उनके लिए संवेदना आज की सबसे बड़ी प्राथमिकता समझी जानी चाहिए। इसके अलावा, आगे आने वाले अन्य जोशीमठों के लिए हम इन आपदाओं से क्या सबक लेते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए। इन सारी बातों को अगर समेट कर कहा जाए, तो प्रकृति और पर्यावरण न तो सरकारों को बख्शती और न गैर सरकारी संगठनों को, न गरीब को देखती है और न अमीरों को। आज जोशीमठ या अन्य इलाकों की आपदाओं में घर-गरीबों का बहुत बुरा हाल होता है।
ऐसी बहसों में अक्सर हम भटक जाते हैं। फिर जब हमें सरकारों को ही साधना है, तो हमारी पुरजोर कोशिश होनी चाहिए कि संरक्षण व संवर्धन की पहल कैसी हो? वैसे इन सब में सबसे बड़ी रणनीति सरकारों को ही साधने की होनी चाहिए। नुकसानदेह प्रतीत होती योजनाओं के प्रति शुरुआती दौर में सही कदम उठाए जाने चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि सरकार की समझ बेहतर करना उसकी नुमाइंदगी करना नहीं होता। और न ही इस पर सरकारी तरफदारी का लेबल लगाना चाहिए। अपने दायित्वों में सरकारों को साधना भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए, जितना कि उनको चुनना।
अलग उत्तराखंड राज्य मांगने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा यही था कि हम किस तरह से दूर-दराज के पहाड़ी गांवों में समृद्धि लाएंगे। प्रकृति के संरक्षण की बात को विकास विरोधी नहीं कहा जा सकता। यह कैसे भुलाया जा सकता है कि जब यह राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब हमारी सबसे बड़ी मांग यही थी कि पहाड़ी इलाकों को सही तवज्जो नहीं मिलता और हमारे अनुरूप उन योजनाओं को बल नहीं मिलता है, जो कि यहां की आर्थिकी और पारिस्थितिकी से मेल खाती हैं। जब उत्तराखंड राज्य की मांग हो रही थी, तो पूरे आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी गांव के लोगों और महिलाओं की ही थी। इससे साफ है कि उत्तराखंड को, खासतौर पर गांवों को भी विकास चाहिए, लेकिन उसकी शैली कैसी हो, यह शायद सबसे बड़ी बहस का विषय होना चाहिए। विकास का विरोध नहीं है, बल्कि विकल्प वाली शैली हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। उसमें उत्तराखंड की शैली, हिमालय की प्रकृति और प्रवृत्ति को जोड़कर देखे जाने की बातें आज सबसे महत्वपूर्ण हैं।
सच यह है कि आपदा कई कारणों का दुष्परिणाम होती है। किसी भी पहाड़ में, जिसके नीचे नदी बहती हो, कटाव निश्चित है और वह हमेशा पहाड़ को किसी न किसी रूप में संवेदनशील बनाए रखेगी। फिर अपने बोझ से ज्यादा एक गांव शहर बन जाता है और उस पर भी बहुत से शहरी तौर-तरीके, जिनमें ड्रेनेज, वॉटर सिस्टम और सीवेज को सही स्थान नहीं मिलता। फिर एक समय के बाद कहीं न कहीं पूरा पहाड़ अनियंत्रित हो जाता है। इसको हमें पहाड़ के डूबने की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए कि यह कल घाटी में डूब जाएगा, बल्कि यह मानकर चलना चाहिए कि पहाड़ की ऊपरी परत ज्यादा बोझ और नीचे कटाव से कटती चली जा रही है और फिसल रही है। फिर भी उन तमाम योजनाओं के, जो इस पहाड़ या अन्य पहाड़ों के चारों तरफ है, काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े होने ही चाहिए। खासतौर से सड़कों के निर्माण की शैली और विधि या अन्य जो भी ढांचागत बड़े विकास की बात है, उसको लेकर चर्चा होनी ही चाहिए।
बड़े बांधों से ऊर्जा के उत्पादन को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन बड़े बांधों के विकल्प की सबसे बड़ी आवश्यकता का भी समय आ चुका है। गाढ़-गदेरों को अगर हम ऊर्जा के लिए तय करेंगे, तो स्थानीय भागीदारी और दावेदारी भी बढ़ेगी और साथ में पर्यावरणीय जोखिम कम होगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि केदारनाथ की त्रासदी के बाद देश सहम गया था और पहाड़ को एक विपदा के रूप में देखने लगा था, और दो साल तक पूरे उत्तराखंड में पर्यटन, जो राज्य के राजस्व का एक बड़ा स्रोत है, पर प्रतिकूल असर पड़ा था। फिर ये सब सीमावर्ती क्षेत्र हैं। इनमें किसी भी प्रकार गलत विवाद व खींचातानी देशहित में नहीं है, खासतौर से तब, जब पड़ोसी हम पर नजर गड़ाए हुए हो। इस पहलू को नकारा नहीं जा सकता।
हमें आपदाओं के प्रति गंभीर समझ बनानी चाहिए, न कि हम इसे ऐसे बवाल के रूप में खड़ा करें, जो लोगों में भय व अनिश्चितता पैदा कर दे। हमें स्थानीय संसाधनों, प्राथमिकताओं और हर तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच ही पनपना है। इसलिए विश्वास व भरोसे से ही रास्ता निकलेगा।
हम ही सरकारें बनाते हैं, इसलिए उसको अपनी आवश्यकता और प्राथमिकताओं के अनुरूप साधने का काम हम नहीं, तो क्या अमेरिका और इंग्लैंड के लोग करेंगे! खाली विवादों और विरोधों में फंसे रहकर हम रास्ते नहीं सुझा पाएंगे। अगर आने वाली पीढ़ी का भविष्य संभालना है, तो जोशीमठों को जमघट जैसी त्रासदियों से भी बचाना होगा। हम एक तंत्र हैं, जिसकी मर्यादा का पालन हमें खुद भी करना है और सरकारों से भी करवाना है। तभी हम बचेंगे और बचा भी पाएंगे।