अंधेरी रात थी। घने काले बादल गरज-गरज कर बरस रहे थे। महाराज श्रेणिक और महारानी चेलना अपने झरोखे से वर्षा का आनंद ले रहे थे। तभी दूर कहीं बिजली चमकी और उसकी रोशनी में दोनों ने देखा कि एक वृद्ध बारिश में उफनती नदी के तट से लकड़ियां बीन रहा है। उस वृद्ध का श्रम देखकर दोनों चिंतित हो गए। राजा श्रेणिक ने उस व्यक्ति को महल में बुलवा लिया।
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सुबह उसे बेशकीमती रेशमी वस्त्र तथा हाथों में हीरों की अंगूठियां पहने देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। उसने कहा, मुझे लोग मम्मण सेठ कहते हैं। एक अभाव को पूरा करने के लिए ही मैं रात में लकड़ियां इकट्ठा करता हूं। कमी के बारे में पूछने पर उस सेठ ने कहा, मेरे पास एक सुंदर बैल है, उसी की जोड़ी का दूसरा बैल मुझे चाहिए। राजा ने उस बैल को देखने की उत्सुकता जताई।
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अगले दिन चेलना और मंत्री के साथ महाराज श्रेणिक सेठ के घर पहुंचे। यथोचित सत्कार के बाद सेठ उन्हें अपने मकान के तहखाने में ले गया। जैसे ही उसने बैल के सामने से पर्दा हटाया, चारों ओर रंग-बिरंगा प्रकाश फैल गया। सामने हीरे, मोती तथा रत्नों से जड़ित एक सोने के बैल की मूर्ति थी। राजा, रानी और मंत्री उस बैल को देखकर अवाक रह गए। सेठ ने कहा कि वर्षों पहले मैंने धन को एक स्थान पर सुरक्षित रखने के लिए यह बैल बनवाया था। इसे देखकर लगा कि ऐसा ही दूसरा बैल होता, तो कितना अच्छा रहता!
राजा, रानी तथा मंत्री आश्चर्यचकित होकर सेठ की बातें सुन रहे थे। राजा को कभी सेठ के उस बैल पर विस्मय होता, तो कभी सेठ पर तरस आता, कि वह अपनी धन-संपदा का सुख भोगने या दान पुण्य करने के बजाय बैल बनाने में लगा है, जो उसके लोभ को और बढ़ाने का काम करेगा।