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इस बांग्लादेश को नहीं पहचानती

Mon, 17 Apr 2017 07:38 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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तस्लीमा नसरीन
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प्राचीन चीन में एक सिद्धांत प्रचलित था। वह यह कि तुम दूसरे किसी के साथ ऐसा सलूक न करो, जो तुम्हारे साथ होने पर तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा। यह सिद्धांत अच्छा इंसान बनने में मदद करता है। इस सिद्धांत पर अमल करने से नीति और आदर्शों के लिए अलग से धर्म की आवश्यकता नहीं है। लेकिन होता इसका उल्टा है। धर्म पर विश्वास करते हुए भी लोग चोरी-डकैती, बलात्कार और दूसरे अपराधों में लिप्त होते हैं। शायद उनमें यह भोला विश्वास रहता है कि धार्मिक होने पर सारे पाप कट जाएंगे।
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बीती सदी के छठे-सातवें दशक में मैं जिस बांग्लादेश में रहती थी, उस बांग्लादेश में धर्म तो था, लेकिन धर्म के साथ वैसी प्रदर्शनप्रियता नहीं थी। धर्म का मतलब जोर-जबर्दस्ती करना और आंखें तरेरना नहीं था। तब दाढ़ी रखने, टोपी पहनने और महिलाओं के लिए बुर्का ओढ़ने की अनिवार्यता नहीं थी। बूढ़े-बुजुर्गों और रिटायर्ड लोगों मंे नमाज पढ़ने का जितना चलना था, उतना युवाओं में नहीं था। इससे धर्म को कोई हानि नहीं हुई। लेकिन बाद में धर्म को जबर्दस्ती संविधान, शिक्षा प्रतिष्ठान, यहां तक कि समाज में सर्वत्र लाद दिया गया। इसका नतीजा अच्छा नहीं होने वाला, इसका अनुमान मैंने बीती सदी के अस्सी के दशक में ही लगा लिया था। पर धर्म को अतिरिक्त महत्व देने के खिलाफ आवाज उठाने पर लोग, सरकार और समाज मेरे ही विरुद्ध खड़े हो गए।

अपने बचपन और किशोरावस्था में मैंने ऐसा बांग्लादेश नहीं देखा था। यहां तक कि अपने यौवन में भी मैंने ऐसे बांग्लादेश की कल्पना नहीं की थी। बांग्लादेश के लोगों की कौन कहे, वहां रह रहे मेरे परिवार के लोग तक अब पूरी तरह बदल गए हैं। हमारा परिवार आदर्शवादी था। हमारे घर में नमाज पढ़ने, टोपी पहनने या हिजाब बांधने का चलन नहीं था। बाबा (पिता) ने हम बहन-भाइयों को ईमानदारी, सभ्यता, शिक्षा, संवेदनशीलता आदि की सीख दी। लेकिन अब हमारे उसी परिवार में अद्भुत बदलाव देख रही हूं। जैसे, मेरे बड़े भैया के चेहरे पर अब दाढ़ी है, जबकि मूंछ नदारद है। बड़े भैया हमेशा क्लीन शेव रहते थे और सूट-बूट में बहुत खूबसूरत दिखाई देते थे। अब वह पाजामा-कुर्ता पहनते हैं और सिर पर टोपी भी रखते हैं।  अब वह पांचों वक्त नमाज पढ़ते हैं। पूरे दिन तस्बीह जपते हैं। अपने बच्चों को उन्होंने डॉक्टर-इंजीनियर तो बनाया, साथ में धर्मांध भी बनाया। बड़े भैया कविता पत्रिका के संपादक थे। वह कविता पढ़ते थे, कविता लिखते थे, गाने सुनते थे, फिल्म देखते थे, प्रेम करते थे, फोटो खींचते थे और कभी-कभी घूमने के लिए निकल जाते थे। यानी वह कुल मिलाकर एक शौकीन आदमी थे। तब वह मुझसे बहुत स्नेह करते थे। मैं घर में जब भी आती, वह मुझसे मिलते, बात करते। लेकिन अब उनका मुझसे कोई संपर्क नहीं है। बाबा की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति पर मेरा जितना अधिकार बनता था, उसे उन्होंने अपने नाम कर लिया है। उससे हालांकि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे अगर दुनियावी संपत्ति के प्रति लालच होता, तो एक सिद्धांत के तहत दशकों से एकाकी जीवन नहीं बिता रही होती। लेकिन बड़े भैया को देखने के बाद मेरा यह विश्वास गाढ़ा हुआ है कि धर्मांध व्यक्ति मूलतः स्वार्थी भी होता है। लेकिन मेरे बड़े भैया को संभवतः यह भरोसा होगा कि चूंकि वह धार्मिक हैं, धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं, इसलिए उन पर किसी पाप का धब्बा नहीं लगेगा। यह भरोसा ही धार्मिक लोगों को गुनाह करने के लिए दुष्प्रेरित करता है। मैंने ऐसे अनेक लोग देखे, जिन्होंने अपने जीवन में बहुत गुनाह किए हैं। लेकिन हज करके आने के बाद समाज के प्रति उन लोगों का नजरिया बदल गया।
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मेरे मामा का परिवार मुक्तियोद्धाओं का परिवार है। उस परिवार के अनेक लोगों ने मुक्तियुद्ध में हिस्सेदारी की। बचपन में मेरे जो मामा धर्म के प्रति जरा भी उत्साही नहीं थे, वह भी अब दाढ़ी रखते हैं और पांचों वक्त नमाज पढ़ते हैं। मेरे एक मामा से बचपन में मेरा बड़ा जुड़ाव था। चूंकि मुक्तियुद्ध के उस दौर में मेरे पिता को भी भागना पड़ा था, लिहाजा हमारा पूरा परिवार ननिहाल में था। वहां हम अमूमन रातों को भैंसागाड़ी पर बैठकर एक गांव से दूसरे गांव तक भागते फिरते थे। उस अभियान में हमारे वह मामा काफी सक्रिय रहते थे। तब वह हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतंत्र, आजादी आदि के बारे में बताते थे। दिसंबर, 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश की स्थापना के बाद उसी मामा के साथ हम सब देश का नया झंडा लेकर गांव-गांव घूमे थे और खुशियां मनाई थीं। वही मामा आज न केवल परम धार्मिक हैं, बल्कि वह इससे भी इन्कार करते हैं कि बांग्लादेश में धर्म के नाम पर आतंक फैलाने वाले लोग हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश को बदनाम करने के लिए इस तरह का षड्यंत्र रचा जा रहा है। कोई आदमी आखिर इतना कैसे बदल सकता है!

यह बदलाव सिर्फ मेरे परिवार तक सीमित नहीं है। कॉलेज में मेरे साथ पढ़ने वाले तमाम दोस्त धार्मिक हो गए हैं। उस दौर के दोस्तों के सिर पर आज टोपियां हैं, सहेलियां हिजाब बांधती हैं। धर्म का वायरस पूरे देश में फैल गया है। बेशक धर्म के इस प्रचार के पीछे राजनीति ही है। अब धर्म लाखों रुपये के हज में, हिजाब-बुर्का, टोपी और दाढ़ी में तब्दील हो गया है। धर्म अब कमजोर की मदद करने और संयम का परिचय देने में नहीं है, बल्कि धार्मिक होने की प्रतिद्वंद्विता में और अधिक से अधिक मदरसे और मस्जिदों के निर्माण में है।

क्या यह वही बांग्लादेश है, जिसके लिए हमने संघर्ष किया था? अपनी उदार बांग्ला संस्कृति को तिलांजलि देकर बांग्लादेशी अरब संस्कृति में रंगते जा रहे हैं। जबकि अरबों ने अपनी जमीन पर बंगालियों का सिर काटने में कभी संकोच नहीं किया। इसी कारण अपने प्रिय बांग्लादेश को मैं अब पहचान नहीं पाती।
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