अपनी सप्ताह भर की तवांग यात्रा के बाद दलाई लामा दिल्ली होते हुए वापस धर्मशाला लौट गए। इस यात्रा के दौरान वह तवांग क्षेत्र के विभिन्न बौद्ध मठों में गए। तीन दिन तक लगभग एक लाख श्रद्धालुओं के सामने प्रवचन किया। वरिष्ठ लामाओं से विभिन्न मुद्दों पर एकांत वार्ताएं कीं और विदा होने से पहले घोषणा की कि वह अगले वर्ष जनवरी में कालचक्र कार्यक्रम में भाग लेने के लिए फिर तवांग आएंगे। उनकी इस यात्रा के दौरान चीन उन्हें और भारत को धमकाता रहा। लेकिन दलाई लामा ने चीन से अधिक उलझने में रुचि नहीं दिखाई। चीन के आरोप का उत्तर देते हुए उन्होंने यह अवश्य कहा कि भारत ने कभी उनका उपयोग करने का प्रयत्न नहीं किया। भारत सरकार ने भी चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कहा कि दलाई लामा एक धार्मिक नेता हैं और उन्हें भारत में कहीं भी जाने की स्वतंत्रता है। तवांग पर चीनी दावे का अधिक तीखा उत्तर अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने दिया। उन्होंने कहा कि अरुणाचल की सीमाएं तिब्बत से लगती हैं, चीन से नहीं।
चीन की वास्तविक चिंता तवांग नहीं, दलाई लामा हैं। चीन मानता है कि दलाई लामा और उनके प्रतिष्ठान ने यह सोचना आरंभ कर दिया है कि वह पंद्रहवें दलाई लामा के रूप में कहां जन्म लेंगे। दलाई लामा अभी 81 वर्ष के हैं। कुछ समय पहले उन्होंने घोषित किया था कि जब वह 90 वर्ष के हो जाएंगे, तो अपने पुनर्जन्म के बारे में अन्य लामाओं से विचार-विमर्श कर कुछ निर्णय करेंगे। उस समय उनके प्रतिनिधियों और चीन के बीच कोई मध्य मार्ग निकालने के लिए वार्ताएं भी चल रही थी। अब लगता है कि चीन किसी बीच के रास्ते के लिए उत्सुक नहीं है। वह केवल यह चाहता है कि वर्तमान दलाई लामा परंपरागत पद्धति से पुनर्जन्म के द्वारा अपने उत्तराधिकारी का निर्णय न कर पाएं। दलाई लामा ने कुछ समय पहले कहा था कि वह चीन के बाहर हैं, इसलिए उनका पुनर्जन्म भी चीन के बाहर ही होगा। आम तौर पर तवांग और मंगोलिया को उनके पुनर्जन्म के संभावित स्थानों के रूप में देखा जाता है। इसी कारण पिछले वर्ष जब वह धार्मिक उद्देश्य से एक निजी यात्रा पर मंगोलिया गए, तो चीन ने मंगोलिया पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। चीन के दबाव में मंगोलिया को घोषित करना पड़ा था कि वह आगे कभी दलाई लामा को अपने यहां नहीं आने देगा।
चीन भारत पर ऐसा कोई दबाव नहीं डाल सकता। इसलिए दलाई लामा को लेकर उसकी चिंता बढ़ती जा रही है। चीन ने तिब्बतियों को दलाई लामा से अलग करने की हरसंभव कोशिश की है। तिब्बत में चीनी आबादी को हस्तांतरित कर उसके जन-भूगोल को बदलने का प्रयत्न किया जा रहा है। तिब्बत में भारी निवेश करते हुए चीन ने उसका भौतिक स्वरूप बदल दिया है। उसका दावा है कि स्थानीय तिब्बती चीनी प्रशासन की नीतियों से संतुष्ट हैं और अब उन्हें दलाई लामा में कोई रुचि नहीं है। लेकिन तिब्बतियों के वास्तविक मनोभावों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। चीन खुद अपनी मूल आबादी के बारे में आश्वस्त नहीं है। अगर चीन के मुख्य भाग में साम्यवादी तानाशाही के विरुद्ध विद्रोह हुआ, तो तिब्बती 1912 की तरह फिर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर सकते हैं।
चीन जानता है कि जब तक दलाई लामा का पद है, तब तक वह तिब्बतियों की राजनीतिक निष्ठा के बारे में आश्वस्त नहीं रह सकता। चीन में दलाई लामा के बाद पंचम लामा के सर्वाधिक अनुयायी हैं। चीन ने पंचम लामा के पद पर अपने चुने हुए व्यक्ति को बिठाकर उस पद की गरिमा गिराने का प्रयत्न किया है। ऐसा ही वह दलाई लामा के पद के साथ करना चाहता है। दलाई लामा ने कोशिश की कि चीन 1949 की संधि के आधार पर तिब्बत की स्वायत्तता स्वीकृत कर उन्हें ल्हासा लौटने दे। पर चीनी शासक तैयार नहीं हुए। अब तक दलाई लामा कहते रहे हैं कि यह निर्णय आम तिब्बतियों को करना है कि वे दलाई लामा का पद बनाए रखना चाहते हैं या नहीं। चीन को उसमें दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अब लगता है कि दलाई लामा चीन के रुख से निराश होकर भविष्य के बारे में निर्णय की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए तैयार हो गए हैं।
चीन ने 1950 में तिब्बत पर जबरन कब्जा किया था। चीन का यह दावा सही नहीं है कि तिब्बत सदा उसकी अधीनता में रहा है। तिब्बत केवल मंगोल और मांचू शासकों के अधीन रहा था। दलाई लामा को दोनों ही शासक धर्मगुरु की प्रतिष्ठा देते रहे। दलाई लामा शब्द तो मंगोल शासकों का ही दिया हुआ है। 1912 में जब चीन की राष्ट्रीय क्रांति के द्वारा मांचू शासन समाप्त हुआ, तो मांचुओं के अधिपत्य से तिब्बत ने भी खुद को मुक्त कर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। 1949 में च्यांग काई शेक पर मार्क्सवादियों की विजय हुई। 1950 में चीनी सेना की एक टुकड़ी ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया। अगर जवाहरलाल नेहरू ने तिब्बत की स्वतंत्रता और भारत की सुरक्षा का ध्यान रखा होता और चीन के आक्रमण को सफल न होने दिया होता, तो आज हमारी उत्तरी सीमाएं इतनी संकटग्रस्त न होतीं।
भारत सरकार ने औपचारिक रूप से अपनी तिब्बत नीति भले न बदली हो, पर वह दलाई लामा के विरुद्ध चीन के षड्यंत्र को सफल नहीं होने देगा। अब तक चीन भारत को जिस तरह चारों ओर से घेरने की कोशिश कर रहा है, आगे कभी भारत को भी तिब्बत के बारे में अपनी नीति बदलनी पड़ सकती है। भारत में इस समय एक लाख बीस हजार तिब्बती शरणार्थी हैं। इसके अतिरिक्त 1959 से अब तक हर वर्ष दो से चार हजार तिब्बती धर्मशाला पहुंचते ही हैं। उनमें काफी संख्या उन बच्चों की भी होती है, जो परंपरागत तिब्बती शिक्षा पाने के लिए चीन से धर्मशाला पहुंचते हैं। इन सब तथ्यों से चीन का तिब्बत संबंधी प्रचार गलत ही सिद्ध होता है। आने वाला समय तिब्बतियों के लिए कठिन होगा। पर भारत को उनकी स्वतंत्रता और अपनी सुरक्षा की खातिर उनके साथ खड़े दिखना चाहिए।