देश की राजनीतिक नगरी में आयोजित महान विभूतियों के पद्म श्री, भूषण और विभूषण सम्मान समारोह में स्वर्ग की परियों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
कई दिनों तक सोच-विचार के बाद स्वर्ग के प्रशासन ने यह कहकर परियों को अनुमति नहीं दी कि जब उस देश में उनकी अपनी 'परियां' सुरक्षित नहीं हैं, तो वे हमारी परियों को कितनी सुरक्षा दे पाएंगे? पर परियां ठहरीं परियां! वे अपने रिस्क पर सम्मान समारोह में आ पहुंची।
समारोह खत्म होने के बाद जब वे लौट रही थीं कि एक नन्ही परी प्रदर्शनकारियों की भीड़ में बिछुड़ गई। भीड़ से भरी सड़क होने के बाद भी वह अकेली रोती रही।
ढलती सांझ! अपनों का इंतजार करती नन्ही परी लाल किले के पास तिरंगे के नीचे बैठी थी, अपने नन्हे-नन्हे पंख समेटे हुए। इधर-उधर आती-जाती भीड़ को देखती, सहमी-सहमी सी। ऊफ! इत्ते लोग! उसे लग रहा था कि वह कहीं सुरक्षित हो या न हो, तिरंगे के नीचे तो सुरक्षित रहेगी ही।
तभी विक्रम के घर जाता बेताल उधर से गुजरा। अचानक उसकी नजर खुद में सिमटी नन्ही परी पर पड़ी। उसके बंजर मन में पता नहीं कहां से वात्सल्य उमड़ आया। वह ऑटो से उतरा और उसके पास जा पहुंचा। उसने नन्ही परी को अपनी बांहों में भरने की कामना करते हुए कहा, हे नन्ही परी! तुम यहां कैसे? देखो तो सांझ ढल रही है।
आओ, मैं तुम्हें घर छोड़ दूं!
नन्ही परी ने उससे दूर होते हुए कहा, नहीं! मैं यहां सुरक्षित हूं। तिरंगे के नीचे! मेरे घरवाले लेने आ रहे हैं। बेताल थोड़ा और नजदीक आते हुए बोला, अरी पगली! तुम जैसी तो यहां दिन में भी सुरक्षित नहीं रहतीं। चलो मेरे घर!
देखो, मैं तुम्हारे फूफा-सा हूं।
नहीं! मुझे इस देश के हर फूफा से डर लगता है, कहकर वह नन्ही परी परे हो गई, तो बेताल ने फिर कहा, अच्छा चलो तुम्हारे मामा-सा हूं!
नहीं, मुझे इस देश के मामा से भी डर लगता है।
तो ठीक है, मैं तुम्हारे पिता-सा हूं!
नहीं, मुझे इस देश के हर पिता से डर लगता है, कहकर वह नन्ही परी और किनारे हो गई।
यह देखकर बेताल ने खुद पर थूकते हुए कहा, अरी पगली! मैं आदमी नहीं हूं! बेताल हूं बेताल...
बेताल ने ज्यों ही यह कहा, नन्ही परी उठी और चुपचाप बेताल की पीठ पर जा चढ़ी, मुस्कुराती हुई, खिलखिलाती हुई!