जब हम धर्मग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो जीवन-दर्शन को लेकर कई प्रसंग उनमें दिखते हैं। ऐसे प्रसंग बताते हैं कि दीन-हीन व्यक्ति भी अगर आदर्श को आत्मसात कर ले, तो देश-समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है।
एक दिन एक युवक महात्मा ईसा के पास आया। अभिवादन करने के बाद उसने प्रार्थना की, महात्मन! मुझे जीवन सफल बनाने के सरल उपाय बताइए। ईसा ने कहा, जैसा तुम अपने साथ व्यवहार कराना चाहते हो, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ करो। तमाम बुराइयों से बच जाओगे।
युवक यह सुनकर उलझन में पड़ गया। उसने कहा, मैं आपकी बात समझ नहीं पाया, महात्मन। ईसा बोले, जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तब क्या चाहोगे? उस व्यक्ति ने जवाब दिया, मैं चाहूंगा कि बुढ़ापे में मुझे कष्ट व अभाव नहीं हो। अभावों से जीना दूभर न हो जाए।
ईसा ने उसे प्रेरणा देते हुए कहा, अच्छा तो तुम आज से ही माता-पिता की सेवा शुरू कर दो। उन्हें किसी चीज का अभाव न होने दो। बुढ़ापे में तुम्हारी औलाद भी तुम्हारा ध्यान रखेगी।
कुछ क्षण रुककर ईसा ने फिर कहा, तुम आनंदपूर्वक जीना चाहते हो, तो दूसरों को भी जीने दो। किसी की हत्या करने और कष्ट पहुंचाने की कल्पना भी नहीं करो। इन चंद बातों का पालन कर तुम अपना जीवन सार्थक कर सकते हो।
और इन गुणों को जीवन में अपनाकर वह व्यक्ति ईसा का सबसे प्यारा शिष्य बन गया।