वह मरियल चीते की तरह दबे पांव मेरे कमरे में आए और मेरी दोनों आंखें अपनी हथलियों से बंद करने के बाद हंसते हुए बोले, बूझो तो कौन?
मैंने उनकी हथेलियों की खुरदराहट पहचानने के तुरंत बाद कहा, कौन क्या? पड़ोस के लेखक हैं आप। और कौन हो सकता है ऐसी हथेलियों वाला!
इतना सुनने के बाद भी वह हंसते हुए बोले, इसे कहते हैं सहृदय पाठक! सच कहूं, तो पाठकों के इस संकट के दौर में भगवान मिलना आसान है, लेकिन एक लेखक को सच्चा पाठक मिलना बहुत ही दुर्लभ है।
आपने अपने बगल में यह किताब जैसी क्या दबा रखी है, मैंने सहमते हुए पूछा, तो वह सीना तानकर बोले, मेरी नई किताब आई है कल ही। सोचा, सबसे पहले आपको ही सप्रेम भेंट करूं।
किस पर किताब लिखी है? मोदी पर, राहुल पर प्रियंका पर या केजरीवाल पर? आजकल तो इसी का सीजन है! मैं उत्साहित होकर बोला।
उन्हें एक झटका-सा लगा। हताश होते हुए वह बोले, मैं तो कवि-लेखक हूं। अपने मन की अनुभूतियों पर, अपने अनुभवों पर लिखूंगा। दूसरों के बारे में मैं क्या बता सकता हूं।
लेकिन यह किताब आपने गलत समय पर लिखी है! चुनाव के समय कुछ लहर-वहर पर बात होनी चाहिए थी। खैर किताब में मेरी दिलचस्पी मानो खत्म हो गई थी। मैंने उनको कहना शुरू किया, सच तो यह है कि मुझे किताबों से बचपन से ही बहुत डर लगता आया है। जब तक घर में रहता हूं, टेलीविजन देखता हूं, किताब पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। इसलिए आपको एक सच्चे दोस्त की हैसियत से नेक सलाह देता हूं कि मुझे अपनी यह किताब सप्रेम भेंट कर एक कॉपी खराब मत कीजिए।
अगर आपकी पढ़ने में रुचि नहीं, तो आपके कमरे में इतनी किताबें क्यों हैं? लेखक ने सवाल दागा।
ताकि आप जैसे बुद्धिजीवी दोस्तों में भ्रम बना रहे। ये सभी किताबें मेरे पिता के वक्त की हैं!
लेखक जाने के लिए तैयार थे। मैं उन्हें क्यों रोकता?