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इंसान का अहंकार: ‘मैं’ से मुक्त होकर ही परमात्मा को पा सकते हैं; भ्रम दूर होते ही अनंत की ओर उन्मुख होगा जीवन

आचार्य रजनीश Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 29 Oct 2024 05:03 AM IST

सार

हम सारा जीवन अपने इस अहंकार यानी ‘मैं’ में गुजार लेते हैं। इसी ‘मैं’ की रक्षा के लिए हम भवन खड़े कर लेते हैं, धन के पहाड़ खड़े कर लेते हैं। यश और पद की दौड़ के पीछे भी ‘मैं’ ही है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला/एएनआई


मनुष्य का अहंकार अद्भुत है। यह जो हमारा ‘मैं’ है, यह मोक्ष तक पीछा करता है। इसके लिए हम मोक्ष भी खोजते हैं। यह ‘मैं’ है क्या? एक आदमी तप कर सकता है, और यह तपश्चर्या ‘मैं’ के लिए ही दौड़ है, स्वयं को ‘मैं’ से भरने और इसे पूरा करने की। और मनुष्य जब थक जाता है और परेशान हो जाता है, तब वह पाता है कि यह ‘मैं’ उसे दुख और पीड़ा के अलावा कुछ नहीं दे रहा। ऐसे में उसके भीतर ‘मैं’ को त्यागने का विचार उत्पन्न हो सकता है। उसे लगने लगता है कि अब मैं इस ‘मैं’ को छोड़ दूंगा, अहंकार मुक्त हो जाऊंगा, विनम्र हो जाऊंगा, मैं सब त्याग दूंगा, जंगल की ओर चला जाऊंगा। लेकिन कौन चला जाएगा जंगल? कौन करेगा त्याग? जब आप सब कुछ त्याग कर जंगल की ओर चल देंगे, तब भी आपके भीतर का ‘मैं’ ही संतुष्ट होगा कि मैंने त्याग किया, मुझसे बड़ा त्यागी कोई नहीं। और ऐसे में अगर यह पता चल जाए कि मुझसे भी बड़ा कोई त्यागी आ गया, तो मन के फिर से ईर्ष्या से भरते देर नहीं लगेगी। इसलिए अहंकार बड़ा ही अद्भुत है, अनूठा है।


ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे इस ‘मैं’ से छुटकारा मिले। इससे मुक्ति नहीं मिलेगी, तो मनुष्य का दुख से भी पीछा नहीं छूट सकता। अशांति से भी मुक्ति नहीं मिल सकती। अज्ञान भी पीछा नहीं छोड़ेगा। सिर्फ इसीलिए, क्योंकि इस ‘मैं’ को बनाए रखने के लिए ही हम जीवन भर लगे रहे और दूसरों के ‘मैं’ पर हमला करते रहे। अपनी सुरक्षा की यह भावना ही आक्रमण का भाव पैदा करती है। अहंकार से हिंसा पैदा होती है। जहां अहंकार है, वहां हिंसा है, क्योंकि अहंकार आक्रमण है। वह दूसरे को दबाना चाहता है, तभी वह तृप्त होता है।


सूत्र: अपने भ्रम को दूर करें

अहंकार हमारा भ्रम है। जो जिंदगी को पूरा नहीं देख पाता है, उसको यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं कुछ हूं। लेकिन मैं हूं क्या, यह कोई नहीं जानता। इसलिए मैं कुछ हूं, यह एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे कि ‘मैं’ जीवन का सबसे बड़ा झूठ और भ्रम है, उसी समय से जीवन अनंत की ओर उन्मुख हो जाएगा।

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