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समाज: क्यों टूट रही इंसान और कुत्ते की दोस्ती

पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 18 Mar 2023 06:06 AM IST

सार

आवारा कुत्तों की संख्या न बढ़े, उन्हें एंटी रेबीज, एंटी डिस्टेंपर टीके सही समय पर लगें- यह स्थानीय निकाय की जिम्मेदारी है, पर वह लापरवाह होता है।
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आवारा कुत्ते - फोटो : सोशल मीडिया


इंसान और कुत्ते का साथ कोई बारह हजार साल से है। मनुष्य ने सबसे पहले कुत्ता पालना शुरू किया था। आदि काल में कुत्ता इंसान को शिकार करने, घर व फसल की सुरक्षा करने में मदद करता था। सबसे बड़ी बात कम भोजन में भी वफादार बने रहने के गुण ने कुत्तों को इंसानों का सबसे बड़ा विश्वसनीय साथी बना दिया। आज जानवरों में उसकी संख्या सर्वाधिक है। हाल ही में दिल्ली के रंगपुरी में दो छोटे भाइयों को आवारा कुत्तों ने नोच-नोच का मार डाला। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? असल में शहर में जमीन का संकट तो है ही, फिर बहुमंजिला इमारतों ने कुत्तों से वह देहरी भी छीन ली, जहां बैठकर वे बगैर पालतू बने ही चौकीदारी किया करते थे। समझना होगा कि हर कुत्ते का अपना इलाका होता है। जब कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ती है, तो उनका क्षेत्र कम हो जाता है और उसी के अनुसार उनका भोजन और सोने की जगहें भी बंट जाती हैं। ऐसे में कुत्ते असुरक्षित महसूस करते हैं और आक्रामक हो जाते हैं।


विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया में कुत्ते के काटने से होने वाले रैबीज से मौत के 36 प्रतिशत मामले भारत में होते हैं। रेबीज के 30 से 60 प्रतिशत मामलों में पीड़ित की उम्र 15 साल से कम होती है। इसके अलावा, कुत्तों में पीछा करने की आदत होती है। ऐसे में जो लोग कुत्ते को देखकर ही भागने लगते हैं, वे कुत्ते का शिकार बन जाते हैं। कुत्ते कमजोरों पर हमला करते हैं, इसलिए वे बच्चों और बूढ़ों पर हमला कर सकते हैं।


जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक मौसम बदलने या जाड़े एवं गर्मी के अचानक तीव्र होने को भी कुत्ते सहन नहीं कर पा रहे हैं। खतरा महसूस होने पर ही कुत्ते आक्रामक होते हैं। इसके अलावा, शोर, ट्रैफिक, प्रदूषण, कचरे से मांसाहारी खाने का चस्का लगना और वाहनों एवं परिसरों में रोशनी की चकाचौंध ऐसे कारण हैं, जो कुत्ते को हिंसक बना रहे हैं।


बहुत से लोग हमले की आशंका में ही कुत्तों के प्रति हिंसक हो जाते हैं। हालांकि शहर में बंदर या कस्बों में आवारा सांड अधिक नुकसान पहुंचाते हैं और कभी-कभी इंसानों की मौत का कारण बनते हैं। फिर भी बंदरों या सांड के प्रति उतनी नफरत नहीं दिखती। तो क्या इंसान के लिए कुत्ता सबसे निरीह जानवर है, जिस पर वह अपना गुस्सा निकाल सकता है?


आवारा कुत्तों की संख्या न बढ़े, उन्हें एंटी रेबीज, एंटी डिस्टेंपर टीके सही समय पर लगें– यह स्थानीय निकाय की जिम्मेदारी है, पर वह लापरवाह होता है। कुत्तों के प्रति इंसानों की बढ़ती नफरत के मद्देनजर उत्तराखंड हाईकोर्ट का जुलाई, 2018 में दिया गया वह बयान महत्वपूर्ण है, जिसमें कहा गया कि-'जानवरों को भी इंसान की ही तरह जीने का हक है। वे भी सुरक्षा, स्वास्थ्य और क्रूरता के विरुद्ध इंसान जैसे ही अधिकार रखते हैं।'


जब तक समाज के सभी वर्गों तक यह संदेश नहीं जाता कि प्रकृति ने धरती पर इंसान, वनस्पति और जीव-जंतुओं को जीने का समान अधिकार दिया है, तब तक उनके संरक्षण को इंसान अपना कर्तव्य नहीं मानेगा। जीव-जंतु या वनस्पति अपने साथ हुए अन्याय का न तो प्रतिरोध कर सकते हैं और न ही अपना दर्द कह पाते हैं। इसलिए इंसानों को ही उनके प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

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