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हृदयेश-छोटे शहर का बड़ा लेखक

Wed, 02 Nov 2016 06:22 PM IST
मूलचंद गौतम
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हृदयेश
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मुंबई, दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ की तुलना में शाहजहांपुर छोटा शहर है। पर जब उसका क्रांतिकारी इतिहास छोटा नहीं, तो लेखक ही क्यों छोटा होने लगा! भुवनेश्वर उसके आदि लेखक थे, जिनकी ऐतिहासिक टक्कर महाकवि निराला से हुई थी। वह दुर्योग प्रखर प्रतिभा के धनी भुवनेश्वर पर भारी पड़ गया। उनका जो दुखद अंत हुआ, उसके मूल में इस टक्कर का भी हाथ था।
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हृदयेश के चेहरे-मोहरे पर तो छोटे शहर का लेवल फेविकोल से इस तरह फिट होकर चिपक गया था कि आखिर तक छुड़ाए नहीं छूटा। चंडीप्रसाद हृदयेश से परिचित पुराने लोग प्रायः शाहजहांपुर के हृदयेश को कम जानते थे। उनका एक कहानी संग्रह छोटे शहर के लोग नाम से क्या छपा, जैसे यह उनका स्थायी भाव हो गया। भले वह गाहे-बगाहे बड़े शहरों के घाघ महंतनुमा लेखकों-संपादकों-प्रकाशकों से मिलकर उपकृत और धन्य होते रहे, लेकिन छोटू की चिप्पी से पीछा नहीं छुड़ा पाए। यहां तक कि बेटे की कृपा से वह अमेरिका भी हो आए, पर उससे ज्यादा दुखद यात्रा उनके लिए कोई नहीं रही। हवाई अड्डे से बेटे के घर तक, फिर बीमारी की चपेट में और अंततः खाली हाथ बुद्धू की तरह घर वापस। उनकी आत्मकथा जोखिम इन्हीं चिप्पियों से तैयार है।

हृदयेश की कहानियां न्याय विभाग की उनकी नियमित नौकरी की तरह व्यवस्थित थीं। बारीक से बारीक तफसील उनसे छूटती नहीं थी। रचना और पात्रों का परिवेश तथा पृष्ठभूमि की बारीकियां उन्हें खास बनाती थीं या कहें कि हृदयेश मेहनत करके उन्हें खास बनाते थे। सफेद घोड़ा काला सवार का यथार्थ उनका अच्छी तरह रात-दिन देखा-भोगा हुआ यथार्थ था। राणा प्रताप के चेतक की तरह वह हाकिमों की भाषा और इशारा अच्छी तरह समझते थे। जहां नहीं समझ पाते, वहां अपनी हिकमतों से काम निकालते थे। इन्हीं तरीकों के कच्चे-पक्के रह जाने में रचनाएं कहीं कमजोर रह जाती थीं, जैसे-दंडनायक की फैंटेसी। हृदयेश की कहानियों का साहित्य में एक खास मुकाम है। सारिका की जिस कहानी प्रतियोगिता में संजीव की कहानी अपराध को प्रथम पुरस्कार मिला था, उसी में उनकी कहानी को सांत्वना के लायक समझा गया था। यह हृदयेश की विडंबना नहीं थी, दौर ही बदल गया था।
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हृदयेश को पहल सम्मान मिला। उस अवसर पर मैंने उनकी स्पेशल साइकिल का जिक्र किया था, जिसे चलाना उन्हीं के बस की बात थी। एक बार मैं उस साइकिल से उन्हें पीछे बिठाकर सारिका के संपादक अवधनारायण मुद्गल जी से मिलने के लिए चला। थोड़ी असंतुलित होते ही पैर न टिक पाने की वजह से हम दोनों ही मुश्किल से गिरते-गिरते बचे। मुझे लगा कि हृदयेश जी मुझे खींचें, इससे बेहतर है कि मैं उन्हें खींचूं। मुझे क्या पता था कि जिसका साज उसी को साजे। एक बार वीरेन डंगवाल के कहने से मैंने उनका एक साक्षात्कार लिया था। प्रश्नों के लिखित उत्तर उन्होंने मुझे डाक से भिजवा दिए थे, ताकि गलती की कोई गुंजाइश नहीं रहे।

हृदयेश जी से मेरा लंबा पत्राचार रहा। पत्रों का जवाब देने में वह देरी नहीं करते थे। हृदयेश का सीधा-सादा सरल जीवन ही जैसे उनकी रचनाएं थीं। अपनी संतति को भी उन्होंने इन्हीं उसूलों से गढ़ा था। इसीलिए वह आत्ममुग्धता की हद तक उन्हें प्यार करते थे। हंसी-दिल्लगी की बात अलग है, अन्यथा उन्हें अपनी रचनाओं की कटुता की हद तक की जाने वाली आलोचना नापसंद थी। ऐसे सच्चे और खरे हृदयेश के निधन से हिंदी साहित्य ने बहुत कुछ खो दिया है।
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