राजनीतिक मौसम चुपके से बदलते हैं। पिछले सप्ताह उपचुनावों के नतीजे ने साबित किया कि भाजपा कमजोर पड़ रही है। इसके कारण नरेंद्र मोदी को अपने घर में ही मिलेंगे।
प्रधानमंत्री को अपने घर के अंदर ढूंढने होंगे अपने दुश्मन भी और भाजपा के खिसकते जनाधार के कारण भी। नतीजों का विश्लेषण जब करने बैठेंगे भाजपाई, तो शुरू करना चाहिए उत्तर प्रदेश से, जहां उनके सिपहसालारों ने जीती बाजी हारी है। साफ दिखेगा उन्हें कि जिसके हाथों में उन्होंने चुनाव अभियान सौंपा था, वे इस काबिल ही नहीं थे। चुनाव अभियान के शुरू होने से पहले योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा में अपने बयानों से स्पष्ट कर दिया था कि जिस हिंदुत्व के वह प्रचारक हैं, उस हिंदुत्व से हिंदुओं के वोट मिलने भी मुश्किल हैं, मुसलमानों के वोट तो असंभव ही हैं।
फिर भी योगी आदित्यनाथ को खुली छूट दी गई प्रचार की। नतीजा यह कि जहां बातें होनी चाहिए थी परिवर्तन और विकास की, वहां होने लगीं लव जेहाद जैसे फिजूल के मुद्दों की। इसका नतीजा यह हुआ कि जो समाजवादी पार्टी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही थी उत्तर प्रदेश में लोकसभा के चुनाव में, वह दोबारा खड़ी हो गई है। योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं ने यह नेक काम किया है। नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत दिया इस देश के, खासकर उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने इस विश्वास पर, कि वह वास्तव में परिवर्तन और विकास ला सकेंगे भारत में। मोदी उनका विश्वास जीत सके, बावजूद इसके कि कांग्रेस का प्रचार यही था कि परिवर्तन और विकास के पीछे छिपा हुआ है हिंदुत्व का एजेंडा।
योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रचार से साबित कर दिया कि कांग्रेसी ठीक कह रहे थे। असली झटका अगर भाजपा को लगा है उत्तर प्रदेश में, तो छोटे-मोटे झटके गुजरात और राजस्थान में भी लगे हैं, जिनको नजरंदाज नहीं किया जा सकता। मोदी के मंत्रियों ने पिछले सौ दिनों में ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे परिवर्तन का एहसास जाग सके। नई पहल तो दूर की बात, इन्होंने इतना भी नहीं किया है कि उन नीतियों और कानूनों को बदला जाए, जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था में मंदी आई पिछले तीन वर्षों में। भूमि अधिग्रहण कानून में आज तक कोई तब्दीली नहीं लाई गई है, बावजूद इसके कि वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद स्वीकार कर चुके हैं कि इस कानून के रहते रक्षा योजनाओं के लिए भी भूमि अधिग्रहण असंभव हो गया है।
विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए प्रधानमंत्री ने जापान और चीन के राजनेताओं से मुलाकातें की हैं। अगले हफ्ते न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में उनकी भेंट होगी अमेरिकी निवेशकों के साथ। लालफीताशाही के बदले लाल कालीन बिछाने की बातें तो कर रहे हैं प्रधानमंत्री, लेकिन यह भी नहीं हुआ है अभी कि विदेशियों को वीजा मिलना आसान कर दिया जाए। फिलहाल न विदेशी पर्यटकों के लिए भारत आना आसान है, न ही निवेशकों के लिए। इस छोटी-सी चीज में परिवर्तन अगर अभी तक नहीं ला पाए हैं मोदी के मंत्री, तो जो मुश्किल काम हैं, वे उनसे कहां होंगे? कहां से आएगा परिवर्तन? कहां से होगा विकास? कहां से आएंगे वे अच्छे दिन, जिनका वायदा था?