वैश्विक सुस्ती और चीन की अर्थव्यवस्था पर बढ़ती चुनौतियों के बीच आर्थिक मौकों को मुट्ठी में लेने और विकास दर बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे का विकास भारत की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में हम बहुत पीछे हैं। विगत 30 अगस्त को केंद्र सरकार के केंद्रीय अवसंरचना एवं परियोजना निगरानी विभाग द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मई, 2015 तक केंद्रीय बुनियादी ढांचा क्षेत्र से संबंधित कुल 766 केंद्रीय परियोजनाओं में से 237 लंबित हैं, जिनकी लागत 4,826 अरब रुपये है। इसी तरह उद्योग मंडल एसोचैम द्वारा पिछले दिनों प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट में भी कहा गया है कि देश के विकास की रफ्तार को तेज करने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान देना पहली जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के 21 राज्यों में नियामक मंजूरियों के चक्कर में पिछले साल दिसंबर तक करीब 26.5 लाख करोड़ रुपये निवेश की 1,550 से अधिक परियोजनाएं अटकी रहीं। इन अटकी परियोजनाओं में सबसे अधिक 45 प्रतिशत बुनियादी ढांचा क्षेत्र की हैं।
बेशक आजादी के बाद से अब तक की तमाम सरकारें बुनियादी ढांचा विकास को प्राथमिकता देती रही हैं, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे से जुड़े अनिवार्य तत्वों की सीधी कमी अर्थव्यवस्था के विकास में बाधक साबित हुई हैं। देश में बुनियादी ढांचे के विकास के मामले में एक बड़ी कमी यह भी है कि इस क्षेत्र में होने वाले निवेश के बारे में समग्र प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। सरकार के पास पिछले वर्षों के क्षेत्रवार निवेश की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसी तरह न तो विभिन्न बुनियादी विकास क्षेत्रों में प्रस्तुतिकरण की स्थिति जीडीपी के प्रतिशत के रूप में और न ही विभिन्न क्षेत्रों में किए गए निवेश में निजी-सार्वजनिक भागीदारी संबंधी सही-सही आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है। चूंकि विकसित देशों में उपभोक्ता आधार संकुचित होने के कारण वैश्विक निवेशक भारत की तेजी से बढ़ती हुई विकास दर वाली अर्थव्यवस्था में प्रवेश करना चाहते हैं। लिहाजा उन चुनौतियों को खत्म करने की जरूरत है, जिनके चलते निवेशकों को अपनी गति धीमी करनी पड़ रही है।
दोमत नहीं है कि अब बुनियादी ढांचे में निवेश ही वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द देश की भावी विकास गाथा घूम रही है। इसलिए बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश संबंधी कमियों को दूर किया जाना जरूरी है। विस्तृत एवं दक्ष ढांचागत नेटवर्क के लिए जीडीपी का कम से कम 9-10 प्रतिशत इसमें निवेश किया जाना जरूरी है। साथ ही, सार्वजनिक खर्च और बुनियादी निवेश आधारित प्रोत्साहन की नीति एकदम स्पष्ट होनी चाहिए। परियोजना निस्तारण के लिए वर्तमान नीतियों में सुधार करने की भी जरूरत है। इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र के तहत ढांचागत विकास के लिए भारी धन की व्यवस्था भी किए जाने की जरूरत है।
एक ऐसे समय में जब एनडीए सरकार ने देश में ढांचागत विकास के मद्देनजर अनेक सुधारात्मक उपायों पर काम शुरू किया है। क्या हम यह उम्मीद करें कि केंद्र सरकार भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ढांचागत विकास के नीति-नियमों और दिशा-निर्देशों में बड़े बदलाव और उनके कारगर क्रियान्वयन की डगर पर आगे बढ़ेगी?